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इंसानियत शर्मसार,जनवरी में थमी गरीब स्वीपर की सांसें, अक्टूबर तक सुमित्रा बाई के नाम पर मलाई कूटता रहा CMHO दफ्तर !

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लोकायुक्त के जाल में फंसने के बाद भी ‘जुगाड़’ से कुर्सी पर लौटीं डॉ.शोभा पटेल निलंबित,मृत कर्मचारी के नाम पर पौने दो लाख डकारने वाली भ्रष्ट सिंडिकेट का भंडाफोड़ ।

घनश्याम शर्मा माचलपुर

राजगढ़ / माचलपुर :- सरकारी सिस्टम में भ्रष्टाचार किस कदर असंवेदनशील और अंधा हो चुका है, इसका एक रोंगटे खड़े कर देने वाला उदाहरण राजगढ़ जिले में सामने आया है। यहां एक गरीब महिला सफाईकर्मी की मौत के बाद भी, स्वास्थ्य विभाग के आला अफसर करीब पौने दो लाख रुपए का सरकारी फंड डकार गए। इस महाघोटाले की मुख्य सूत्रधार और राजगढ़ की प्रभारी मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. शोभा पटेल को शासन ने तत्काल प्रभाव से सस्पेंड कर दिया है ।

संचालनालय लोक स्वास्थ्य एवं चिकित्सा शिक्षा मप्र के आयुक्त धनराजू एस द्वारा 01 अक्टूबर 2026 को निलंबन का यह कड़ा आदेश (क्रमांक 4/शिका/सेल-5/भोपाल/2026/1953) जारी किया गया है ।

“शर्मनाक: जनवरी में थमी सांसें, अक्टूबर तक बंटता रहा वेतन”

भ्रष्टाचार जब संवेदनाओं का कत्ल कर दे,तो राजगढ़ के स्वास्थ्य विभाग जैसा महापाप जन्म लेता है।। यह सिर्फ सरकारी खजाने में सेंधमारी का मामला नहीं, बल्कि एक मृत गरीब के नाम पर खेली गई गिद्ध-शासकीय सियासत है। तारीख 18 जनवरी 2025 को इस सिस्टम के सबसे निचले पायदान पर खड़ी एक गरीब स्वच्छकर्मी श्रीमती सुमित्रा बाई की सांसें हमेशा के लिए थम गईं। नियम कहते हैं कि मौत के साथ ही इंसान का नाम सरकारी फाइलों से सम्मानपूर्वक हटा दिया जाना चाहिए, लेकिन राजगढ़ के स्वास्थ्य महकमे के रसूखदारों को सुमित्रा बाई की मौत में भी अपनी ‘कमाई’ का जरिया नजर आया ।

साजिश और दलाली के इस गंदे मकड़जाल की पराकाष्ठा देखिए— 28 जनवरी 2025 को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र डाबला के मेडिकल ऑफिसर ने पूरी ईमानदारी के साथ सुमित्रा बाई की मृत्यु की लिखित रिपोर्ट आला अफसरों को सौंप दी थी। इसके बाद बकायदा हाजिरी रजिस्टर से भी मृतका का नाम गायब कर दिया गया। यानी कागजों पर सुमित्रा बाई इस दुनिया में नहीं थीं, लेकिन जब बात सरकारी खजाने से माल उड़ाने की आई, तो सीएमएचओ दफ्तर के जादूगरों ने मरे हुए इंसान को भी ‘जिंदा’ कर दिया। बिना किसी अटेंडेंस, बिना किसी दस्तखत के, हर महीने सुमित्रा बाई के नाम पर 14,844 रुपये की राशि का आहरण होता रहा। मौत का मातम सुमित्रा बाई के घर में पसरा था, लेकिन सरकारी पैसों की यह मलाई लगातार 9 महीनों तक स्वास्थ्य विभाग की इस भ्रष्ट सिंडिकेट के खातों में उतरती रही। यह कृत्य मप्र के प्रशासनिक इतिहास में वित्तीय अनियमितता का सबसे घिनौना और शर्मसार कर देने वाला अध्याय है ।

“भ्रष्टाचार की सिंडिकेट डॉ. पटेल के साथ ENT स्पेशलिस्ट और बाबू भी दोषी”

जब इस फर्जीवाड़े की शिकायत संचालनालय तक पहुंची,तो क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं (भोपाल) ने तीन सदस्यीय विशेष जांच दल का गठन किया । जांच दल की रिपोर्ट ने स्वास्थ्य विभाग के दावों की धज्जियां उड़ा दीं रिपोर्ट में साफ हुआ कि यह कोई मानवीय भूल नहीं, बल्कि सरकारी खजाने पर सोची-समझी डकैती थी ।

इस वित्तीय अपराध में सिर्फ CMHO डॉ. शोभा पटेल ही नहीं, बल्कि उनकी सिंडिकेट के अहम मोहरे— ईएनटी विशेषज्ञ डॉ. रामगोपाल नोरसे, तत्कालीन सेवानिवृत्त लेखापाल और लेखापाल दिनेश पारिक भी बराबर के दोषी पाए गए हैं ।

“सस्पेंड होकर भोपाल अटैच, नियमों की उड़ी धज्जियां”

शासकीय आदेश में कड़े शब्दों में कहा गया है कि डॉ. शोभा पटेल ने अपने पद का घोर दुरुपयोग किया और शासन को सीधी वित्तीय हानि पहुंचाई। उनका यह कृत्य मप्र सिविल सेवा आचरण नियम 1965 के नियम 3 के उप नियम (i), (ii), (iii) का खुला और गंभीर उल्लंघन है ।

कदाचरण के इस संगीन मामले में उन्हें मप्र सिविल सेवा नियम 1966 के नियम 9(1) के तहत सस्पेंड कर दिया गया है । निलंबन काल में उनका मुख्यालय कार्यालय क्षेत्रीय संचालक स्वास्थ्य सेवाएं, भोपाल तय किया गया है।

“लोकायुक्त की ‘दागी’ को फिर किसने सौंपी थी राजगढ़ की कमान” ?

इस पूरे मामले का सबसे बड़ा और सुलगता हुआ सवाल यह है कि डॉ. शोभा पटेल का ट्रैक रिकॉर्ड पहले से ही बेहद दागदार रहा है । वे पूर्व में भी लोकायुक्त की कार्रवाई में रिश्वत लेते हुए रंगे हाथों (ट्रैप) पकड़ी जा चुकी हैं ।

लोकायुक्त की चार्जशीट के बावजूद, ऐसी प्रशासनिक और राजनीतिक ‘जुगाड़’ बैठी कि उन्हें दोबारा राजगढ़ जैसे बड़े जिले में प्रभारी CMHO की मलाईदार और रसूखदार कुर्सी सौंप दी गई । अब सवाल उठ रहे हैं कि लोकायुक्त की दागी अफसर पर मेहरबान रहने वाले वो ‘आका’ कौन हैं, जिनकी शह पर मृत सफाईकर्मी के पेट पर लात मारकर यह पूरा घोटाला अंजाम दिया गया ?

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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