माचलपुर: बापू के ‘ग्राम स्वराज’ के सपने पर तमाचा मारती जमीनी हकीकत !
— विशेष संपादकीय लेख: खुशी संवाद न्यूज घनश्याम शर्मा माचलपुर
आज पूरा देश 2 अक्टूबर को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की जयंती मना रहा है । मंचों से बापू के ‘ग्राम स्वराज’ और आत्मनिर्भरता के लंबे-चौड़े कसीदे पढ़े जा रहे हैं,लेकिन क्या हमने कभी सोचा है कि बापू के सपनों का वो भारत आज किस हाल में है ? यदि हमें इसकी असली और कड़वी तस्वीर देखनी है,तो हमें राजगढ़ जिले के ऐतिहासिक कस्बे माचलपुर की चौखट पर आकर देखना चाहिए । यहाँ आकर विकास के तमाम ऊंचे दावे रेत के महल की तरह ढह जाते हैं आजादी के अमृतकाल में भी यह कस्बा महज़ एक जगह नहीं, बल्कि हुक्मरानों की बेरुखी और सियासी सन्नाटे की एक जीती-जागती मूक गवाही है । कभी अपनी धमक और रसूख से पूरे जिले में अपनी पहचान रखने वाला माचलपुर,आज अपनी बुनियादी सांसों के लिए भी संघर्ष कर रहा है।
“उद्योगों का अभाव: भटकाव की राह पर कस्बा और अंकों के खेल में उलझा भविष्य”
बापू चाहते थे कि हर हाथ को काम मिले और कुटीर उद्योगों से गांव-कस्बे समृद्ध हों । इसके उलट, माचलपुर की सबसे बड़ी त्रासदी यहाँ बड़े उद्योग-धंधों का न होना है रोजगार की तलाश में भटकती युवा पीढ़ी के पास जब अपनी माटी में कोई रास्ता नहीं बचता,तो वो निराशा के घने अंधेरे में घिर जाती है । उद्योगों के इसी अभाव के कारण बेरोजगार युवा आज भटकाव की गलत राह पर जा रहे हैं जिन हाथों में देश का भविष्य होना चाहिए था,वे आज सट्टे, जुए और अंकों के जानलेवा खेल में अपना सब कुछ गंवा रहे हैं । अंकों का यह मायाजाल माचलपुर की एक पूरी पीढ़ी की नसों में जहर घोल रहा है, लेकिन व्यवस्था आंखें मूंदे बैठी है । क्या बापू ने इसी युवा शक्ति की कल्पना की थी ?
“सत्ता पक्ष की निष्क्रियता और स्वार्थी विपक्ष की खामोशी: कौन संवारेगा नगर” ?
इस बदहाली के लिए जितनी जिम्मेदार प्रशासनिक नीतियां हैं, उतनी ही जिम्मेदार यहाँ की स्वार्थी राजनीति भी है । एक तरफ सत्ता पक्ष है, जो अपनी भूमिका और अधिकारों का सही उपयोग करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है जनता ने जिस भरोसे के साथ उन्हें अपनी कमान सौंपी थी, वे जनभावनाओं पर खरे उतरने केबजाय मूकदर्शक बने हुए हैं ।
वहीं दूसरी तरफ विपक्ष की स्थिति और भी शर्मनाक है लोकतंत्र में विपक्ष का काम सरकार की कमियों को उजागर करना और जनता की आवाज बनना होता है । लेकिन माचलपुर में आधा विपक्ष अपने निजी स्वार्थ में डूबा हुआ सत्ता के ही गीत गा रहा है । जब रक्षक ही भक्षक के साथ सुर में सुर मिलाने लगें, तो जनता अपनी फरियाद लेकर कहाँ जाए? सत्ता पक्ष की अकर्मण्यता और विपक्ष की इस स्वार्थी सौदेबाजी के बीच सबसे बड़ा सवाल यही खड़ा होता है कि आखिर ऐसे में इस नगर के विकास को कौन संवारेगा ?
“शिक्षा का सूना आंगन: जहां बेटियों के हौसले और बेटों के सपने दम तोड़ते हैं”
कहते हैं कि शिक्षा वो रोशनी है जो अंधेरे को चीर देती है, लेकिन माचलपुर को जान बूझकर इसी रोशनी से महरूम रखा गया है । ताज्जुब होता है कि इस बड़े अंचल में आज भी बच्चों के लिए एक अदद कॉलेज तक नहीं है। स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद यहाँ के युवाओं के कदम ठहर जाते हैं ।
इससे भी बड़ा दुर्भाग्य हमारी बेटियों का है। बापू ने महिला शिक्षा और उनके सशक्तिकरण पर सबसे ज्यादा जोर दिया था, लेकिन माचलपुर की बच्चियों के लिए अलग से शासकीय कन्या हायर सेकेंडरी स्कूल तक उपलब्ध नहीं है । सह-शिक्षा में असहजता या सुरक्षा की चिंता के कारण न जाने कितनी ही होनहार बेटियाँ दसवीं या बारहवीं के बाद कलम छोड़ने पर मजबूर हो जाती हैं ।
“स्मृतियों के खंडहर में तब्दील होती नामी कृषि उपज मंडी”
माचलपुर के अतीत का पन्ना पलटें तो एक गौरवशाली इतिहास सामने आता है। किसी ज़माने में यहाँ की कृषि उपज मंडी राजगढ़ जिले की नामी और सबसे संपन्न मंडियों में शुमार होती थी । दूर-दराज से किसान अपनी उपज लेकर यहाँ आते थे, व्यापारियों की चहल-पहल से पूरा शहर गुलजार रहता था । लेकिन आज इस ऐतिहासिक धरोहर को सियासत और प्रशासनिक उपेक्षा का ऐसा जंग लगा है कि इसकी रौनक इतिहास के पन्नों में दफन हो चुकी है। मंडी का यह सन्नाटा दरअसल यहाँ के किसानों और व्यापारियों की बदहाली का मरसिया है, जो बापू के ‘किसान प्रधान भारत’ की अवधारणा का उपहास उड़ाता है ।
“स्वास्थ्य सेवाएं: सियासत का अखाड़ा और इलाज को तरसती जनता”
किसी भी सभ्य समाज में स्वास्थ्य सेवा पहली प्राथमिकता होती है, लेकिन माचलपुर में इसे भी राजनीति की भेंट चढ़ा दिया गया । यहाँ का प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आज भी अपने उन्नयन की राह देख रहा है । इस स्वास्थ्य केंद्र को आधुनिक चिकित्सा का केंद्र बनाने के बजाय, इसे नेताओं ने अपनी राजनीति का अखाड़ा बना दिया है । नतीजतन, आधी रात को अगर किसी मां, बच्चे या बुजुर्ग की तबीयत बिगड़ जाए, तो आज भी माचलपुर के लोगों को तड़पते हुए जिला अस्पताल या दूसरे बड़े शहरों की ओर दौड़ना पड़ता है ।
“बापू के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि क्या है” ?
कॉलेज का अभाव, बेटियों के स्कूल का टोटा, दम तोड़ती मंडी, युवाओं का भटकाव और राजनीति की सूली पर चढ़ी स्वास्थ्य व्यवस्थाएं—यह माचलपुर की आज की कड़वी हकीकत है। आज गांधी जयंती पर केवल बापू की प्रतिमा पर सूत की माला चढ़ा देना ही काफी नहीं है। सच्ची अंजलि तब होगी जब हम उनके सिद्धांतों को जमीन पर उतारेंगे ।
माचलपुर के प्रबुद्ध पाठकों और नागरिकों, अब वक्त आ गया है कि इस खामोशी को तोड़ा जाए। यह चुप्पी हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को अंधकार में धकेल रही है। हमें जागना होगा, संगठित होना होगा और हुक्मरानों के गिरेबान पर हाथ डालकर अपने हिस्से का विकास मांगना होगा। माचलपुर को कोई खैरात नहीं, अपना खोया हुआ गौरव और हक चाहिए। आइए, आज गांधी जयंती पर संकल्प लें कि हम अपने अधिकारों के लिए अपनी आवाज बुलंद करेंगे ।










