
जब पीढ़ी आगे बढ़ाने के लिए संतान नहीं थी,तो दो मेहनतकश बहनों ने अपनी जीवनभर की कमाई से पत्थरों को बना दिया अपना उत्तराधिकारी ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर “किदवंती पर आधारित”
“देवरा बल्डी के मूक गवाह”
राजगढ़ / माचलपुर :-
मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले में स्थित माचलपुर नगर न केवल अपनी कृषि और व्यापारिक गतिविधियों के लिए जाना जाता है,बल्कि यह अपने दामन में कई ऐतिहासिक राज भी समेटे हुए है । माचलपुर की सरहदों पर स्थित देवरा बल्डी नामक पहाड़ी पर आज भी पत्थर के दो प्राचीन,नक्काशीदार स्तूप (स्मारक) जीर्ण-शीर्ण अवस्था में खड़े हैं । ये स्मारक किसी बड़े राजा, महाराजा या सेनापति की जीत के प्रतीक नहीं हैं, ये गवाह हैं—होलकर शासनकाल की दो ऐसी साधारण महिलाओं के अनूठे स्वाभिमान और अटूट हौसले के, जिन्होंने अपनी मेहनत के दम पर इतिहास के पन्नों में खुद को हमेशा के लिए अमर कर लिया । यह विस्तृत कहानी उन्हीं दो सगी बहनों की है,जिन्हें दुनिया आज ‘छनियारी और पनिहारी’ के नाम से जानती याद करती है ।
“परिचय और दो विपरीत काम : जब कर्म ही बन गया नाम”
होलकर राजवंश के दौर में माचलपुर नगर में दो सगी बहनें रहती थीं, समय के थपेड़ों और मौखिक इतिहास की सीमाओं के कारण उनके असली नाम तो इतिहास के गर्त में कहीं खो गए,लेकिन समाज में उनके द्वारा किए जाने वाले साधारण कामों को ही उनकी पहचान बना दिया गया है :
पनिहारी (जल सेवा का संकल्प): बड़ी बहन का मुख्य कार्य सुबह की पहली किरण के साथ ही शुरू हो जाता था । वह माचलपुर की प्रसिद्ध प्राचीन केवड़ा बावड़ी और नगर के अन्य कुओं से अपने सिर पर घड़े रखकर पानी भरने का काम करती थी ।
छनियारी (धरती की सेवा): छोटी बहन का काम दूसरी दिशा में था । वह दिनभर तपती धूप में देवरा बल्डी की पहाड़ियों और रास्तों पर घूम-घूमकर ‘छान’ यानी कंडे (गोबर के उपले) बीनने का काम करती थी । मालवी बोली में छान बीनने के कारण उसका नाम ‘छनियारी’ पड़ा ।
“जनसेवा और ईमानदारी की कमाई”
पनिहारी बहन का कार्य केवल अपने लिए नहीं था, वह पूरे माचलपुर नगर के लिए एक जीवनदायिनी की तरह थी ।
नगरवासियों के घरों तक जल : उस दौर में जब घरों में आधुनिक नल या सुख-सुविधाएं नहीं थीं,तब पनिहारी बहन नगर के नागरिकों के घरों तक पीने का शुद्ध जल पहुंचाती थी ।
राहगीरों के लिए प्याऊ: माचलपुर से होकर गुजरने वाले राहगीरों,थके-हारे व्यापारियों और यात्रियों की प्यास बुझाने के लिए वह पहाड़ी के रास्तों और सार्वजनिक स्थानों पर बने प्याऊ (जल स्रोतों) को हमेशा पानी से लबालब भर कर रखती थी ।
वह कोई बंधुआ मजदूर नहीं थी अपनी इस कड़ी मेहनत और निस्वार्थ जल सेवा के बदले नगरवासियों से उसे जो भी थोड़ी-बहुत मजदूरी या पाई-पाई मिलती थी वह उसे बेहद सहेज कर रखती थी । यही हाल छनियारी बहन का भी था,जो कंडे बेचकर मिलने वाले पैसों को अपनी छोटी सी पोटली में जमा करती जाती थी ।
“एक अनूठा संकल्प: कोई वंश नहीं, तो पत्थरों को बनाया उत्तराधिकारी”
जैसे-जैसे समय बीता,दोनों बहनें युवावस्था से वृद्धावस्था की ओर बढ़ने लगीं । दोनों बहनों ने आजीवन अविवाहित रहने का फैसला किया था । उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी सिर्फ लोकसेवा और कड़े परिश्रम में गुजार दी ।
एक शाम, जब वे देवरा बल्डी पहाड़ी पर बैठी थीं,तो उन्हें इस बात का गहरा अहसास हुआ कि उनके परिवार या वंश को आगे बढ़ाने वाला कोई संतान या उत्तराधिकारी नहीं है । उनके मन में यह विचार आया कि उनके मरने के बाद, इस दुनिया से उनका नामोनिशान हमेशा के लिए मिट जाएगा और लोग उनके संघर्षमय जीवन को भुला देंगे।
इसी क्षण दोनों बहनों ने एक ऐतिहासिक और दृढ़ संकल्प लिया—“भले ही हमारा नाम लेने वाला हमारा कोई सगा वंशज न हो, लेकिन हम अपनी मेहनत की कमाई से कुछ ऐसा खड़ा करेंगे जो सदियों तक आने वाली पीढ़ियों को हमारा नाम याद दिलाएगा ।”
“देवरा बल्डी पर स्मारकों का निर्माण,पत्थरों में ढला स्वाभिमान”
दोनों बहनों ने जीवन भर कड़े परिश्रम से जोड़ी गई अपनी एक-एक पाई और पूरी जमा पूंजी को बाहर निकाला । उन्होंने उस दौर के श्रेष्ठ शिल्पकारों को बुलाया और देवरा बल्डी पहाड़ी की चोटी पर पत्थरों पर आकर्षक नक्काशीदार दो बेहद सुंदर और भव्य स्तूपों (स्मारकों) का निर्माण शुरू करवाया ।
अटूट-प्रेम की निशानी: दोनों बहनों में इतना अगाध प्रेम था कि उन्होंने इन स्मारकों को अलग-अलग जगह बनाने के बजाय एक-दूसरे के बिल्कुल समीप (आस-पास) बनवाया । वे चाहती थीं कि जिस तरह जीवन में वे कभी अलग नहीं हुईं, उसी तरह इतिहास भी उन्हें कभी जुदा न कर पाए।
स्मारकों का नामकरण: पनिहारी बहन के पैसों से बने खूबसूरत स्तूप को जनता ने ‘पनिहारी स्तूप’ का नाम दिया और छनियारी बहन के कंडे बीनने की कमाई से बने स्मारक को ‘छनियारी स्मारक’ कहा गया।
“निष्कर्ष और वर्तमान स्थिति,माचलपुर की अमर धरोहर”
जब दोनों बहनों ने इस दुनिया से विदा ली,तो उनका रोने वाला कोई सगा संबंधी नहीं था,लेकिन उनकी दूरदर्शिता और स्वाभिमान का नतीजा आज सबके सामने है। सदियां बीत गईं, होलकर राजवंश का समय चला गया,लेकिन आज भी माचलपुर की देवरा बल्डी पर खड़े वे स्तूप चिल्ला-चिल्ला कर उन दो आम महिलाओं की महान गाथा सुनाते हैं ।
स्थानीय इतिहास के अनुसार,ये स्तूप केवल पत्थरों के ढांचे नहीं हैं, बल्कि यह इस बात का जीवित प्रमाण हैं कि कैसे दो सामान्य महिलाओं ने बिना किसी वंश या राजा के संरक्षण के, केवल अपने आत्मसम्मान और अटूट इच्छाशक्ति के बल पर खुद को इतिहास में हमेशा के लिए अमर कर लिया । आज पूरा माचलपुर नगर ही नहीं क्षेत्र उनका परिवार है जो उनकी इस विरासत पर गर्व करता है ।










