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जाग उठा शिवतत्व: गुप्तनाथ के दरबार से बरसेगी कृपा, मन के मरुस्थल में लगेगी सावन की झड़ी !

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आत्मा से परमात्मा का मिलन,सावन की रिमझिम में जागृत होती शिव-चेतना,संकटमोचक शिव: शरणागत को गले लगाते बाबा गुप्तनाथ !

[घनश्याम शर्मा माचलपुर ]

तपती गर्मी और सांसारिक चिंताओं से व्याकुल मानव मन को शांति की शीतलता प्रदान करने के लिए आज से पावन श्रावण मास का प्रारंभ हो रहा है । सावन सिर्फ एक महीना नहीं है, बल्कि यह प्रकृति का परमात्मा से और आत्मा का शिव से मिलन का अलौकिक उत्सव है । जब आसमान से स्वाति नक्षत्र की ठंडी बूंदें धरा को चूमती हैं,तो प्रकृति का रोम-रोम पुलकिस हो उठता है, ठीक उसी तरह ‘ॐ नमः शिवाय’ की गूंज से भक्तों का हृदय आनंद से सराबोर हो जाता है । यह समय अपने भीतर छिपे उस शिवतत्व को जगाने का है,जो परम कल्याणकारी है ।

“प्रकृति का अनूठा अभिषेक और महादेव का प्रिय मास”

श्रावण मास में प्रकृति स्वयं सावन की अनवरत झड़ी लगाकर देवाधिदेव महादेव का जलाभिषेक करती है । चारों ओर फैली हरियाली मानो धरती पर बिछी हरी चुनर है,जो शिव-शक्ति के अर्धनारीश्वर रूप की जीवंत गवाही देती है, शास्त्रों के अनुसार,शिव का अर्थ ही ‘कल्याण’ है । सावन के महीने में वायु की हर एक लहर,पत्तों की हर सरसराहट मानो मौन होकर महादेव की स्तुति कर रही हो । जल तत्त्व के स्वामी शिवजी को यह महीना इसलिए प्रिय है क्योंकि यह पूरी सृष्टि को तृप्ति और नवजीवन प्रदान करता है ।

श्री गुप्तनाथ महादेव: हमारे अंचल के रक्षक और अगाध आस्था के दिव्य पुंज”

“दुनिया की हर संकट से बाबा, आप ही राह दिखाते हो ! हे गुप्तनाथ शरण में आए भक्त को,आप गले से लगाते हो।”

जब हम शिव भक्ति की बात करते हैं,तो हमारे नगर और आस-पास के संपूर्ण क्षेत्र पर महादेव की असीम अनुकंपा साक्षात् रूप में प्रकट होती है । हमारे क्षेत्र के रक्षक और हम सभी के प्राणप्रिय ‘श्री गुप्तनाथ महादेव’ का दिव्य विग्रह इस पूरी धरा की आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है । मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से गुप्तनाथ के चौखट पर शीश नवाता है, महादेव उसके जीवन के सारे गुप्त संकटों,कष्टों और संतापों को पल भर में हर लेते हैं । सावन के इस पावन महीने में जब दूर-दूर से कांवड़िए और स्थानीय श्रद्धालु हाथों में पवित्र जल लेकर,नंगे पैर ‘बम-बम भोले’ और ‘हर-हर महादेव’ के गगनभेदी जयकारों के साथ गुप्तनाथ मंदिर की ओर बढ़ते हैं,तो पूरा मार्ग साक्षात् शिवलोक जैसा प्रतीत होने लगता है । सुबह की दिव्य मंगल आरती की अलौकिक खुशबू से लेकर,संध्याकाल में होने वाले बाबा के भव्य और मनमोहक श्रृंगार तक—गुप्तनाथ दरबार की छटा हर आंख को सजल और हर मन को निहाल कर देती है । यहाँ अमीर-गरीब, ऊंच-नीच का हर भेद मिट जाता है और पूरी श्रद्धा सिर्फ एक शिव-नाम में विलीन हो जाती है ।

“नीलकंठ का संदेश: जीवन के विष को संयम का अमृत बनाना”

“जिसने पी लिया विष का प्याला, जग को अमृत का दान दिया,उस देवों के देव महादेव ने, सृष्टि का हर संकट थाम लिया।”

महादेव का स्वरूप अनूठा है; वे जितने भोले हैं, उतने ही गंभीर हैं, समुद्र मंथन के समय जब सृष्टि को बचाने के लिए उन्होंने हलाहल विष को अपने कंठ में धारण किया, तब वे ‘नीलकंठ’ कहलाए । आज के दौर में शिव का यह रूप हमें सिखाता है कि जीवन में मिलने वाली कड़वाहट, ईर्ष्या,क्रोध और अपमान के विष को समाज में फैलाकर अशांति पैदा करने के बजाय,उसे अपने भीतर संयम से रोकना सीखें । दूसरों के दोषों को क्षमा करना और संसार को केवल प्रेम,करुणा और परोपकार का अमृत बांटना ही सच्चा शिवत्व है ।

“केवल व्रत नहीं, अहंकार के विसर्जन का महापर्व बेलपत्र की तीन पत्तियां,जब शिव चरणों में चढ़ती हैं, तो मिट जाता है सब अहंकार, जीवन की राहें संवरती हैं।”

सावन में सोमवार के व्रत, कांवड़ यात्रा और रुद्राभिषेक का अनंत फल है,लेकिन बाहरी पूजा तब तक अधूरी है जब तक आंतरिक शुद्धि न हो । भगवान शिव को अर्पित किया जाने वाला विल्वपत्र (बेलपत्र) हमारे तीन गुणों—’सत्व,रज और तम’ का प्रतीक है । शिव पर बेलपत्र चढ़ाने का वास्तविक आध्यात्मिक अर्थ है—अपने अहंकार, वासना और अज्ञान को ईश्वर के चरणों में समर्पित कर देना । सावन का उपवास केवल अन्न का त्याग नहीं, बल्कि मन से बुरे विचारों का त्याग है,आइए, इस पावन सावन में केवल शिवालयों में जल न चढ़ाएं, बल्कि गुप्तनाथ महादेव की छत्रछाया में अपने भीतर छिपी दया,सेवा और परोपकार की गंगा को भी प्रवाहित करें । जब हृदय में परहित का भाव जागेगा, तभी सावन की असली फुहार हमारे जीवन को धन्य कर पाएगी ।

“जय गुप्तनाथ महादेव”! “हर-हर महादेव”!

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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