
न मशीनों का शोर,न महँगे डीजल की मार,राजगढ़ के इन छोटे किसानों का तो आज भी बैल जोड़ी ही है संसार ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
राजगढ़ / माचलपुर :- आज का भौतिक दौर तकनीक का है, खेतों में बड़ी-बड़ी मशीनें,गड़गड़ाते ट्रैक्टर और पलक झपकते ही फसल साफ कर देने वाले कंबाइन हार्वेस्टर आम बात हो चुके हैं । लेकिन राजगढ़ जिले के माचलपुर नगर सहित आसपास के कुछ ग्रामीण इलाकों में आज भी वक्त ठहर सा गया है । यहाँ के खेतों से गुजरें, तो कानों में किसी ट्रैक्टर का कर्कश शोर नहीं, बल्कि बैलों के गले में बंधी घुंघरुओं और तांबे की घंटियों की रुनझुन और किसान की ‘हेल-भेल’ की सुरीली आवाजें सुनाई देती हैं । यह विशेष ग्राउंड रिपोर्ट आपको सीधे 1980 और 90 के दशक की उन सुनहरी यादों में ले जाएगी,जिन्हें आज की पीढ़ी सिर्फ किताबों में पढ़ती है ।
“स्मृतियों के झरोखे से जब ‘हल-बैल’ ही होते थे किसान की शान”
माचलपुर के आसपास के गांवों में कुछ ऐसे छोटे और सीमांत किसान हैं,जो आर्थिक तंगी या अपनी छोटी जोत के कारण आज भी पारंपरिक तरीके से ही खेती कर रहे हैं । सुबह की पहली किरण के साथ जब ये किसान अपने कंधों पर लकड़ी का भारी ‘हल’ और ‘जूड़ा’ रखे, हाथ में ‘पैना’ (बैलों को हांकने वाली छड़ी) लिए खेतों की ओर बढ़ते हैं, तो बुजुर्गों की आंखें सजल हो उठती हैं । यह दृश्य उस सुनहरे दौर की याद दिलाता है जब गांव के हर घर के बाहर बैलों की जोड़ी बंधी होती थी । दोपहर में जब मां-बहनें सिर पर कपड़े का ‘इंडोनी’ रख उस पर ‘भाता’ (दाल-बाटी या रोट-चटनी) लेकर खेत पहुंचती थीं,तो पीपल,बरगद आदि घने पेड़ की छांव में किसान और बैल दोनों एक साथ सुस्ताते थे । तब किसान की संपन्नता किसी ट्रैक्टर से नहीं,बल्कि उसके खूंटे पर बंधे बैलों की जोड़ी से व बैल के स्वास्थ्य से आंकी जाती थी ।
“महँगाई की मार और मिट्टी से सच्चा प्यार”
आज जहां डीजल की किल्लत और आसमान छूती कीमतें और ट्रैक्टरों का भारी-भरकम किराया छोटे किसानों की कमर तोड़ रहा है, वहीं क्षेत्र के इन किसानों के लिए इनकी बैल जोड़ी ही सबसे बड़ा सहारा है । एक स्थानीय बुजुर्ग किसान ने दैनिक उज्जवल से बात करते हुए भावुक मन से कहा, “ट्रैक्टर तो हमारी धरती मां की छाती को कड़ा कर देता है, लेकिन हमारे ये बैल जब खेतों में मद्धम-मद्धम चलते हैं, तो मिट्टी भुरभुरी और उपजाऊ बनी रहती है । हमें भले ही मेहनत ज्यादा लगती है, लेकिन जो सुकून इस पारंपरिक खेती में है, वो मशीनों की भागदौड़ में कहाँ !
“मशीनीकरण का सबसे काला अध्याय, ‘केड़ा’ (बछड़ा) होना बना अभिशाप”
इस आधुनिक खेती ने जहां इंसानों का काम आसान किया, वहीं हमारी गोवंश संस्कृति पर ऐसा प्रहार किया जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है । माचलपुर के बुजुर्ग किसान याद करते हुए बताते हैं कि तीन-चार दशक पहले जब घर में बछड़ा (केड़ा) जन्म लेता था, तो पूरे कुनबे में घी-गुड़ बांटकर खुशियां मनाई जाती थीं । वही बछड़ा आगे चलकर किसान का दाहिना हाथ बनता था और उसकी कीमत ट्रैक्टर जितनी होती थी । दीपावली पर पशुपालक जब बैलों के सींगों को हिंगुल से रंगते थे और उन पर मयूर पंख बांधकर ‘गोवर्धन पूजा’ उनकी पूजा करते थे, रात्रि में जुलूस निकालते थे तो वह नजारा अद्भुत होता था साथ महिलाएं गीत गाती थी लेकिन आज ? ट्रैक्टरों ने इन मूक पशुओं को अप्रासंगिक बना दिया है । आज गाय दूध देती जैसे बंद होती है वैसे ही बछड़े के थोड़े बड़े होते ही लोग उन्हें सड़कों पर आवारा छोड़ देते हैं, जहाँ से इनका सफर अक्सर कसाईखानों के अंधेरे में खत्म होता है । माचलपुर के खेतों में चलते ये गिने-चुने बैल आज इस बात की गवाही दे रहे हैं कि कभी इस धरती पर इनका भी एक सम्मानजनक मुकाम था ।
“आधुनिकता के समंदर में परंपरा का यह टापू”
यह सच है कि आर्थिक रूप से संपन्न न होने के कारण ये किसान मशीनों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं,लेकिन अनजाने में ही सही, इन्होंने हमारी उस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को बचाकर रखा है जो तेजी से विलुप्त हो रही है । आज जब दुनिया ऑर्गेनिक खेती और प्रकृति के करीब लौटने की बातें करती है, तब माचलपुर के ये खेत बिना किसी बनावट के शुद्ध ‘जीरो-बजट’ और प्राकृतिक खेती का जीवंत उदाहरण पेश कर रहे हैं । बदलाव प्रकृति का नियम है और मशीनीकरण समय की मांग, लेकिन मशीनों की इस अंधी दौड़ के बीच माचलपुर के खेतों में हल चलाती यह ‘बैल जोड़ी’ हमें रुककर यह सोचने पर मजबूर करती है कि आधुनिक होने की होड़ में हमने पीछे क्या-क्या छोड़ दिया है ।










