
केवल मानसून के भरोसे खेती करने वाले छोटे किसानों पर सबसे बड़ा संकट,महंगे बीजों की दोबारा बोवनी करना नामुमकिन ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
राजगढ़ / माचलपुर :- माचलपुर व क्षेत्र में इस समय कृषि और किसानों के हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं । आसमान से बरसती आग और गायब हो चुके मानसून ने खेतों को तवे की तरह तपा दिया है,क्षेत्र के अधिकांश किसान ऐसे हैं, जो पूरी तरह से सिर्फ और सिर्फ प्राकृतिक बारिश के भरोसे ही अपनी खरीफ की फसल लेते हैं । ऐसे में इंद्रदेव की लंबी बेरुखी ने इन गरीब और मध्यमवर्गीय किसानों की कमर तोड़कर रख दी है । खेतों में उग आई आधी अधूरा फसल पानी की बूंद-बूंद को तरसकर अब दम तोड़ रही है । किसान कृत्रिम रूप से उगी फसल को पानी भी देना चाहे तो नहीं दे सकता क्योंकिनहरें बंद, सिंचाई के साधन फेल जिसके कारण चाहकर भी किसान खेतों में कृत्रिम सिंचाई नहीं कर पा रहे हैं । हर किसान के पास निजी कुएं या ट्यूबवेल जैसी सुविधाएं नहीं हैं, जिससे वे अपनी सूखती फसलों को जीवनदान दे सकें, जो फसलें बड़ी उम्मीदों के साथ अंकुरित होकर बाहर आई थीं, वे अब तेज धूप के कारण पीली पड़कर मुरझाने लगी हैं ।
“अब दोबारा बोवनी की हिम्मत नहीं…” — छलका किसानों का दर्द”
क्षेत्र के जागरूक और पीड़ित किसान रामलाल गुर्जर, गोपाल दांगी, छीतर दांगी, मांगीलाल राठौर और कालू सिंह गुर्जर सहित अनेक अन्नदाताओं ने अपनी गंभीर स्थिति साझा करते हुए बताया कि संकट अब सिर के ऊपर से गुजर चुका है । किसानों का साफ तौर पर कहना है कि, “यदि अगले एक या दो दिनों के भीतर झमाझम बारिश नहीं होती है,तो माचलपुर का किसान पूरी तरह बर्बादी की कगार पर पहुंच जाएगा क्योंकि अंकुरित फसल सूखने जमीन के अंदर बीज सड़ जाएगा । बाजार से बेहद महंगे दामों पर कर्ज लेकर बीज खरीदे थे,अब यदि यह फसल सूख गई तो हमारे पास दोबारा बीज खरीदने और फिर से बोवनी करने की आर्थिक हैसियत बिल्कुल नहीं है ।
“लागत डूबने का डर, आसमान की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं किसान”
माचलपुर व गांवों में सुबह होते ही किसान हाथों में चाय का प्याली थामे अखबार या मोबाईल में सबसे पहले मौसम के पूर्वानुमान वाली जानकारी टटोलते या पूछते देखे जा सकते हैं । लेकिन हर सुबह छाई रहने वाली चटक धूप उनकी उम्मीदों पर पानी फेर रही है, साहूकारों सहकारी समिति का कर्ज, परिवार का भरण-पोषण और सूखते हुए खेत इस समय क्षेत्र के हर किसान की चिंता का मुख्य विषय बने हुए हैं । अब देखना यह है कि मौसम विभाग की भविष्यवाणियां और किसानों की प्रार्थनाएं कब रंग लाती हैं और कब प्यासी धरती को बादलों का सहारा मिलता है ।










