
फसलें बदलीं तो मिलें बंद हुईं, पर ‘वैकल्पिक उद्योगों’ के लिए नेताओं ने नहीं हिलाया एक पत्ता,पड़ोसी जीरापुर की ऊंची उड़ान के बीच कब जागेगा माचलपुर का नेतृत्व ?
घनश्याम शर्मा की विशेष रिपोर्ट
राजगढ़ / माचलपुर :- किसी भी क्षेत्र की बर्बादी की कहानी तब शुरू होती है,जब वहां का राजनैतिक नेतृत्व जनता की परवाह करना छोड़ देता है । जब नेता क्षेत्र को विकास की जन्मभूमि मानने के बजाय उसे सिर्फ चुनाव के समय वोट दुहने वाली एक राजनैतिक ‘चारागाह’ समझ लेते हैं, तो जनता का पिछड़ना तय है । राजगढ़ जिले का ऐतिहासिक और कभी व्यापार का बड़ा केंद्र रहा माचलपुर कस्बा आज इसी राजनैतिक अनदेखी, प्रशासनिक लापरवाही और नेताओं के स्वार्थ का सबसे बड़ा शिकार है । आजादी के इतने वर्षों बाद आज जब मध्य प्रदेश के कई छोटे-छोटे कस्बे शहरों की तरह चमक रहे हैं और तरक्की की राह पर दौड़ रहे हैं,ऐसे में माचलपुर वक्त के किसी पुराने पन्ने पर थमा हुआ नजर आता दिखाई दे रहा है । सबसे बड़ा आश्चर्य तो इस बात पर है कि हमेशा सत्ता से जुड़े रहने और बड़े नेताओं से सीधे संबंध होने के बावजूद, यह नगर आज भी अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए तरस रहा है, यहाँ का स्थानीय नेतृत्व जनता के हक के लिए आवाज उठाने में तो बिल्कुल लाचार नजर आता है,लेकिन भोपाल में अपने ‘आकाओं’ की जी-हुजूरी में सबसे आगे रहता है,इसी वजह से आज माचलपुर का हर नागरिक खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है ।
“बदला फसलों का चक्र, पर वैकल्पिक उद्योगों के प्रयास में नेतृत्व रहा ‘शून्य”
एक दौर था जब माचलपुर की गिनती राजगढ़ जिले के समृद्ध व्यापारिक केंद्रों में होती थी । बुजुर्ग याद करते हैं कि इसी नगर में एक समय चार से पांच जीनिंग फैक्ट्रियां पूरी क्षमता से संचालित होती थीं,कपास के साथ-साथ यहाँ मूंगफली की बंपर पैदावार होती थी, जिसके चलते विशाल ऑयल मिलें (तेल कारखाने) चलती थीं साथ ही कपास से रुई निकाल बाहर जाती थी । सैकड़ों परिवारों का चूल्हा इन फैक्ट्रियों से जलता था वक्त बदला, प्राकृतिक कारणों से कपास और मूंगफली की पैदावार कम हो गई,जिससे ये फैक्ट्रियां और मिलें बंद हो गईं । फसल का चक्र बदलना समझ में आता है, लेकिन समझ से परे यह है कि इन मिलों के बंद होने के बाद स्थानीय नेतृत्व ने यहाँ ‘वैकल्पिक उद्योग’ स्थापित करने का कोई प्रयास क्यों नहीं किया ? अगर कपास और मूंगफली नहीं थी, तो क्षेत्र की अन्य फसलों या भौगोलिक स्थिति के आधार पर नए उद्योगों को आमंत्रित किया जा सकता था । लेकिन नेताओं की घोर लापरवाही के कारण माचलपुर का औद्योगिक ढांचा पूरी तरह जमींदोज हो गया और युवाओं को पलायन के लिए मजबूर होना पड़ा ।
“जिले की शान रही कृषि उपज मंडी भी बहा रही आंसू”
बर्बादी की यह दास्तान सिर्फ मिलों तक सीमित नहीं है माचलपुर की कृषि उपज मंडी जो कभी राजगढ़ जिले की अग्रणी और सबसे प्रतिष्ठित मंडियों में शुमार की जाती थी । दूर-दूर के क्षेत्रों व जिलों से किसान अपनी कृषि उपज लेकर यहाँ आते थे,जिससे न केवल किसानों को सही दाम मिलता था, बल्कि नगर के सैकड़ों हम्माल, तुलावटी, छोटे व्यापारी और दुकानदारों की रोजी-रोटी चलती थी । और चहल-पहल से गुलजार रहने वाली यह मंडी आज राजनैतिक इच्छाशक्ति की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव के कारण अपनी बदनसीबी पर आंसू बहा रही है,किसानों के इस बड़े केंद्र को योजनाबद्ध तरीके से उपेक्षित छोड़ दिया गया ।
“नारी सशक्तिकरण का छलावा,10 वीं के बाद बेटियों की पढ़ाई पर राजनैतिक ब्रेक”
आज देश और प्रदेश की सरकारें महिला सशक्तिकरण और ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के बड़े-बड़े दावे करती हैं । लेकिन माचलपुर की जमीनी हकीकत इन दावों की पोल खोलती है,नगर में लड़कियों के लिए कक्षा 10वीं तक कन्या हाई स्कूल तो है, लेकिन सालों से इसके ‘उन्नयन’ यानी हायर सेकेंडरी करने की मांग फाइलों में धूल खा रही है । नतीजा यह है कि 10वीं पास करने के बाद बेटियों को सह-शिक्षा यानी लड़कों के स्कूल में जाना पड़ता है या फिर रूढ़िवादिता और सुरक्षा कारणों से कई गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार अपनी बेटियों की पढ़ाई वहीं रुकवा देते हैं । या मनमानी फीस देकर प्रायवेट स्कूल भेजने को मजबूर है अभिभावक । जो नेता एक कन्या हाई स्कूल का उन्नयन तक नहीं करवा सकते,वे किस मुंह से महिला सशक्तिकरण के मंचों पर बैठते हैं ? माचलपुर की बेटियों की यह अधूरी छूटी पढ़ाई सीधे तौर पर यहाँ के नेतृत्व की नाकामी का परिणाम है ।
“पड़ोसी जीरापुर की तरक्की देती है जख्मों पर नमक”
जब माचलपुर की इस बदहाली की तुलना समीपस्थ जीरापुर से की जाती है, तो दिल और अधिक बैठ जाफ़ता है। जीरापुर आज प्रगति के पथ पर बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ रहा है। वहां विकास योजनाएं जमीन पर उतर रही हैं, नई संस्थाएं बन रही हैं, व्यापार फल-फूल रहा है । इसके उलट, माचलपुर हमेशा सत्ता से जुड़े नेताओं के बावजूद हाशिये पर धकेल दिया गया। यहाँ के नेता सिर्फ राजनैतिक रोटियां सेंकने में व्यस्त हैं, उन्हें नगर के उजड़ते बाजारों, दम तोड़ती मंडी और युवाओं के बिखरते भविष्य से कोई सरोकार नहीं है ।
“मौन तोड़ना होगा,चारागाह नहीं, अब अधिकार चाहिए” !
माचलपुर की जनता को अब यह साफ-साफ समझना होगा कि नेताओं ने इस नगर को सिर्फ चुनाव के समय वोट दुहने वाली गाय समझ रखा है,चुनाव खत्म होते ही वे नगर को अपनी चरागाह बना लेते हैं । अब समय आ गया है जब माचलपुर के स्थानीय राजनैतिक नेतृत्व को अपनी रीढ़ सीधी करनी होगी। उन्हें अपने आकाओं के सामने गिड़गिड़ाना छोड़ना होगा और नगर के हक के लिए सीना तानकर ‘जिद्द’ करनी होगी। यदि आज भी यहाँ नए वैकल्पिक उद्योगों को लाने, मंडी का जीर्णोद्धार करने, कन्या स्कूल का उन्नयन और युवाओं के लिए कॉलेज की व्यवस्था करने का रोडमैप नहीं बनाया गया, तो माचलपुर का यह राजनैतिक नेतृत्व इतिहास के सबसे बड़े गुनहगार के रूप में याद किया जाएगा। जनता अब चुप नहीं बैठेगी, उसे खोखले भाषण नहीं, अपना खोया हुआ गौरव,समृद्ध मंडी और बच्चों का सुनहरा भविष्य चाहिए !










