पारदर्शिता के नाम पर खुली कानून की धज्जियां,शिक्षकों की उपस्थिति और करोड़ों के CSR फंड का हिसाब गोल ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
राजगढ़ / माचलपुर :- सूचना का अधिकार (RTI) अधिनियम,2005 को ताक पर रखकर आवेदकों को गुमराह करने का एक बेहद चौंकाने वाला मामला सामने आया है । स्थानीय जिला मुख्यालय स्थित प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस (शासकीय अग्रणी स्नातकोत्तर महाविद्यालय, राजगढ़) प्रशासन अपने एक अजीबोगरीब जवाब को लेकर सवालों के घेरे में खड़ा हो गया है । आवेदक का सीधा आरोप है कि कॉलेज प्रबंधन ने सूचना देने की कानूनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए विस्तृत और बिंदुवार जानकारी के बदले महज अखबार की कतरनें (कटिंग) और कुछ असमर्थित दस्तावेज थमा दिए हैं ।
“इन गंभीर बिंदुओं पर मांगी गई थी प्रमाणित जानकारी”
प्राप्त जानकारी के अनुसार, ग्राम पाका (तहसील खुजनेर) निवासी रामबाबू गौड़ (पिता बापूलाल गौड़) ने आरटीआई कानून के तहत कॉलेज में एक औपचारिक आवेदन प्रस्तुत किया था । आवेदक ने कॉलेज में शिक्षकों की कुल संख्या, उनकी दैनिक उपस्थिति, छात्र-छात्राओं का कुल डेटा, कॉलेज का परीक्षा परिणाम, CSR मद से खरीदी गई सामग्रियों का विवरण, आय-व्यय का पूरा लेखा-जोखा,बस संचालन की स्थिति,छात्रवृत्ति वितरण तथा NAAC (नैक) मूल्यांकन से संबंधित बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रमाणित’ प्रतियां मांगी थीं ।
“पारदर्शिता के नाम पर खाना पूर्ति”
निर्धारित समयावधि के भीतर कॉलेज के लोक सूचना अधिकारी (PIO) की ओर से आवेदक को जवाब तो भेजा गया,लेकिन जब लिफाफा खुला तो आवेदक हैरान रह गया । आवेदक रामबाबू गौड़ ने बताया कि कॉलेज के भीतर चल रही गतिविधियों और वित्तीय मामलों की स्पष्ट एवं बिंदुवार जानकारी देने के बजाय,जवाब में कॉलेज के शुभारंभ कार्यक्रम से जुड़ी पुरानी अखबार की कटिंग और कुछ निरर्थक दस्तावेजों की फोटोकॉपी संलग्न कर दी गई ।
“अखबार की कटिंग कैसे हो सकती है ‘प्रमाणित’ सूचना”?
इस मामले के सामने आने के बाद अब यह बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि क्या किसी प्रतिष्ठित शासकीय संस्थान द्वारा अखबार की कटिंग उपलब्ध कराना सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत वैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करना माना जा सकता है ? कानूनन,आरटीआई का मूल उद्देश्य नागरिकों को पारदर्शी, प्रमाणित और कार्यालयीन रिकॉर्ड में दर्ज मूल दस्तावेज उपलब्ध कराना है,न कि मीडिया में छपी खबरों की कतरनें बांटना । भ्रामक और अधूरी जानकारी से असंतुष्ट होकर आवेदक रामबाबू गौड़ ने बताया कि मैने हार न मानने का फैसला किया है । आरटीआई अधिनियम के कानूनी प्रावधानों का उपयोग करते हुए बहुत जल्द उच्च शिक्षा विभाग के सक्षम प्रथम अपील अधिकारी के समक्ष अपनी अपील दायर करेंगे ।
“कानून का मज़ाक,अखबार की कटिंग कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं,अधिकारी पर लग सकता है जुर्मानाआरटीआई विशेषज्ञ का मत”
“सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 की धारा 2(j) के तहत आवेदक को केवल वही जानकारी दी जा सकती है जो लोक प्राधिकारी के पास आधिकारिक रिकॉर्ड, दस्तावेज,मेमो,या ईमेल के रूप में मूल रूप से मौजूद हो । अखबार में छपी खबरें किसी भी शासकीय कार्यालय का ‘प्रमाणित रिकॉर्ड’ नहीं होती हैं । यदि लोक सूचना अधिकारी (PIO) ने वास्तविक और बिंदुवार दस्तावेजों (जैसे कैश बुक,अटेंडेंस रजिस्टर) को छुपाने के लिए अखबार की कटिंग का सहारा लिया है,तो यह कानून का स्पष्ट उल्लंघन और जानकारी छुपाने की सोची-समझी कोशिश है । ऐसी स्थिति में प्रथम अपील अधिकारी को तुरंत संज्ञान लेना चाहिए । यदि मामला राज्य सूचना आयोग जाता है, तो आरटीआई अधिनियम की धारा 20(1) के तहत जानकारी छुपाने या गुमराह करने के आरोप में संबंधित अधिकारी पर ₹25,000 तक का व्यक्तिगत जुर्माना और अनुशासनात्मक कार्रवाई हो सकती है ।”










