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शिक्षा माफिया हावी,सरकारी नियमों को ठेंगा दिखा पुस्तक मेले में गायब रहे माचलपुर के निजी स्कूल, अभिभावक हुए परेशान !

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प्रतीकात्मक दुकान

नियमों की सरेआम उड़ीं धज्जियां,जीरापुर पुस्तक मेले से माचलपुर के स्कूलों की किताबें गायब रही,कमीशन खोरी का बड़ा खेला !

घनश्याम शर्मा माचलपुर

 राजगढ़ / माचलपुर :- मध्यप्रदेश शासन के स्पष्ट आदेशों और मप्र राजपत्र में प्रकाशित नियमों को ठेंगा दिखाते हुए माचलपुर क्षेत्र के निजी स्कूलों ने मनमानी की सारी हदें पार कर दी हैं । शिक्षा विभाग का सख्त निर्देश था कि मार्च महीने में आयोजित जिला/ब्लॉक स्तरीय पुस्तक मेले में निजी प्रकाशकों (प्रायवेट पब्लिकेशन) की पुस्तकें उपलब्ध कराई जाएं, ताकि अभिभावकों को राहत मिल सके और वे खुले बाजार की मोनोपॉली से बच सकें। लेकिन जीरापुर में आयोजित इस मेले से माचलपुर के निजी स्कूलों की पुस्तकें पूरी तरह गायब रहीं । बावजूद इसके शिक्षा विभाग ने किसी भी विद्यालय से ये पूछने की जहमत नहीं उठाई कि आपकी स्टॉल मेले में क्यों नहीं ।

“किराया फूंककर पहुंचे अभिभावक,मेले के काउंटर पर मिली मायूसी”

सस्ते दामों और एक ही जगह किताबें मिलने की उम्मीद में माचलपुर नगर के कई गरीब और मध्यमवर्गीय अभिभावक अपनी जेब से किराया लगाकर जीरापुर पुस्तक मेले में पहुंचे थे । दिनभर भटकने के बाद भी उन्हें अपने बच्चों के कोर्स की पुस्तकें नहीं मिलीं,अभिभावकों का आरोप है कि उन्हें जानबूझकर गुमराह किया गया,जब इस संबंध में शिक्षा विभाग के जिम्मेदार अधिकारी से सवाल किया गया, तो उन्होंने गैर-जिम्मेदाराना जवाब देते हुए कह दिया— “माचलपुर के स्कूलों की वहां कोई दुकान नहीं है” अधिकारी के इस बयान से साफ है कि विभाग निजी स्कूलों के आगे बेबस नजर आ रहा है ।

“इन नियमों की सरेआम उड़ीं धज्जियां (मध्य प्रदेश शासन के कड़े कानून)”

माचलपुर के निजी स्कूल और स्थानीय शिक्षा विभाग के अधिकारी मिलकर मध्य प्रदेश सरकार के इन कानूनी प्रावधानों का खुला मखौल उड़ा रहे हैं:

“मप्र निजी विद्यालय (फीस तथा अन्य संबंधित विषयों का विनियमन) अधिनियम’ का उल्लंघन:इस कानून के तहत कोई भी स्कूल प्रबंधन अभिभावकों को किसी एक विशेष दुकान या चुनिंदा बुक स्टॉल से ही किताबें,यूनिफॉर्म या स्टेशनरी खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता ।

“मल्टी-वेंडर नियम की अनदेखी: शासन के नियमनुसार स्कूलों को अपनी किताबों की सूची (कक्षावार) और उनके मूल्य सत्र शुरू होने के कम से कम दो महीने पहले स्कूल के नोटिस बोर्ड और वेबसाइट पर सार्वजनिक करने होते हैं । साथ ही, वे पुस्तकें बाजार में कम से कम 3 से 4 अलग-अलग दुकानों पर उपलब्ध होनी चाहिए ।

“पुस्तक मेले में अनिवार्यता का आदेश हवा-हवाई”
राज्य शिक्षा केंद्र और जिला प्रशासन का स्पष्ट आदेश था कि पुस्तक मेले में सभी निजी प्रकाशकों के स्टॉल लगाए जाएं ताकि अभिभावकों को सीधे प्रकाशक से उचित मूल्य (कमीशन काटकर) पर किताबें मिल सकें । माचलपुर के स्कूलों ने इस आदेश को सिरे से खारिज कर दिया ।

“बाजार में रेवड़ी की तरह बंटा कोर्स,कमिशन का खेल उजागर”

एक तरफ सरकारी पुस्तक मेला खाली रहा,तो दूसरी तरफ नया सत्र शुरू होते ही माचलपुर नगर की चुनिंदा बुक स्टॉलों पर इन निजी स्कूलों का एकाधिकार देखने को मिला । विद्यालयों ने नगर के विशेष बुक सेलर्स पर रेवड़ी की भांति कक्षा वार प्रायवेट पब्लिकेशन का महंगा कोर्स बांट दिया है । अभिभावकों को मजबूरन उन्हीं तय दुकानों से बिना किसी छूट या कमीशन के ऊंचे दामों पर किताबें खरीदनी पड़ रही हैं । जब नियम इतने सख्त हैं, तो फिर प्राइवेट पब्लिकेशन की पुस्तकें मेले में क्यों नहीं पहुंचीं ? इनकी सूचना पूर्व में सार्वजनिक क्यों नहीं की ? इस पर शिक्षा विभाग की रहस्यमयी चुप्पी आम जनता और अभिभावकों के समझ से परे है ।

“अंधेरे में कमीशन का खेल: क्यों गायब हुईं किताबें?”

सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, पुस्तक मेले से माचलपुर के स्कूलों की किताबें गायब रहने के पीछे एक बड़ा “कमिशन का खेल” काम कर रहा है । निजी प्रकाशक और स्कूल प्रबंधन मिलकर तय दुकानों से ३०% से ४०% तक का मोटा कमीशन कमाते हैं । यदि ये किताबें सरकारी मेले में स्टॉल पर आ जातीं, तो अभिभावकों को भारी डिस्काउंट मिलता और स्कूलों का यह गुप्त कमीशन बंद हो जाता। इसी मुनाफे को बचाने के लिए जानबूझकर सरकारी मेले का बहिष्कार किया गया और अब पिछले दरवाजे से चुनिंदा दुकानों के जरिए अभिभावकों को महंगे दामों पर सेट बेचे जा रहे हैं ।

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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