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अमृत सरोवर के दावों के बीच माचलपुर तालाब पर सन्नाटा, दम तोड़ती आस्था को कौन बचाएगा ? माटी की संस्कृति पर भारी पड़ रही जनप्रतिनिधियों की अनदेखी ।

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सात फेरो की किदवंती और आस्था की साक्षी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक अमृत सरोवर अतिप्राचीन धरोहर बड़ा तालाब वजूद खोने की कगार पर !

घनश्याम शर्मा माचलपुर

माचलपुर (राजगढ़) :- जल संरक्षण के विज्ञापनों से अखबारों के पन्ने रंगने वाले और ‘अमृत सरोवर’ के नाम पर पीठ थपथपाने वाले प्रशासन की नाक के नीचे एक जीती-जागती धरोहर दम तोड़ रही है । यह कहानी सिर्फ पानी के एक सूखे सोते की नहीं है, बल्कि माचलपुर की उस माटी की अस्मिता, संस्कृति और अगाध आस्था की है, जो सदियों से इस क्षेत्र की पहचान रही है । करीब 200 बीघा के विशाल भूभाग में फैला माचलपुर का ‘बड़ा तालाब’ आज अपने वजूद को बचाने के लिए चीख-चीखकर गुहार लगा रहा है, लेकिन सत्ता के गलियारों से लेकर प्रशासनिक कुर्सियों तक सिर्फ एक रहस्यमयी खामोशी पसरी है जो समझ से परे है ।

“शिव-पार्वती के विवाह की गवाह है यह माटी”

इस तालाब की लहरों में सिर्फ पानी नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का इतिहास बहता है । स्थानीय धार्मिक किंवदंतियों और मान्यताओं के अनुसार, तालाब के समीप स्थित ‘बाघा बाल्डी’ को जगत जननी माता पार्वती का मायका माना जाता है। यही वह पावन धरा है जहां स्वयं देवों के देव महादेव और माता पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था । उस अलौकिक विवाह के सात फेरों का साक्षी स्थल आज भी यहाँ मौजूद है।बुजुर्ग बताते हैं कि भगवान शिव की बारात के स्वागत में जो महाप्रसाद (चावल) तैयार किया गया था, उसे इसी बड़े तालाब के जल में धोया गया था । यही कारण है कि आज भी जब इस तालाब में पानी लबालब होता है, तो उसका रंग साधारण पानी जैसा नहीं, बल्कि चावल के ‘मांड’ (ओसावन) जैसा श्वेत और गाढ़ा दिखाई देता है। यह आस्था ही है जिसने इस तालाब को हर माचलपुर वासी के दिल से जोड़ रखा है ।

“उपजाऊ मिट्टी बनी अभिशाप,रसूखदारों का ‘खेत’ बना तालाब”

जिस तालाब की मिट्टी को किसान अपने खेतों को जीवन देने के लिए अमृत मानकर ले जाते थे, वही उपजाऊ मिट्टी आज इस तालाब के लिए अभिशाप बन गई है। जैसे ही तालाब का पानी सूखता है या कम होता है, इसके किनारों से सटी जमीनों के मालिक अपनी नीयत बदल लेते हैं। तालाब की सीमा के भीतर घुसकर धड़ल्ले से अतिक्रमण किया जा रहा है और पवित्र जल क्षेत्र में फसलें लहलहा रही हैं। तालाब का तकनीकी रूप से सीमांकन न होना भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के लिए खुली छूट बन गया है ।

“फाइलों में दफन हुआ सौंदर्यीकरण का सपना”

सवाल केवल नीयत का नहीं, बल्कि राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव का भी है । तत्कालीन ऊर्जा मंत्री प्रियवृत सिंह ने कांग्रेस के 15 महीनों के शासनकाल के दौरान इस धरोहर की सुध ली थी । उन्होंने तालाब के कायाकल्प, तालाब के चारों ओर सुंदर घाटों के निर्माण,आधुनिक फव्वारे लगाने और इसे एक भव्य पर्यटन स्थल के रूप में विकसित करने के लिए नगर परिषद की बैठक में इंजीनियर को बाकायदा ‘स्टीमेट’ तैयार करने के निर्देश दिए थे, लेकिन सत्ता की बिसात बदलते ही विकास का वह प्रपोजल ठंडे बस्ते में चला गया । अब आलम यह है कि विकास तो दूर, इस तालाब के अस्तित्व को बचाना भी दूभर हो गया है ! क्या राजनीतिक विचारधाराओं के अलग होने का खामियाजा माचलपुर की जनता और उसकी आस्था भुगतेगी ?

“चेत जाए प्रशासन, भू-माफियाओं के चंगुल में सिसक रहा ऐतिहासिक जलस्रोत, सीमांकन ही एकमात्र विकल्प”

“माचलपुर का बड़ा तालाब सिर्फ पानी का स्रोत नहीं, बल्कि नगर की जीवनरेखा और ऐतिहासिक धरोहर है। दशकों से इसका सीमांकन न होना प्रशासनिक इच्छाशक्ति के अभाव और व्यवस्था की उदासीनता का जीवंत प्रमाण है । स्पष्ट सीमा तय न होने के कारण आज यह धरोहर भू-माफियाओं और अतिक्रमणकारियों के चंगुल में सिसक रही है। यदि नगर परिषद और राजस्व विभाग अब भी नहीं जागे, तो आने वाली पीढ़ियां एक ऐतिहासिक जलस्रोत को सिर्फ कागजों पर देखेंगी । समय आ गया है कि प्रशासन राजनीति और हीला-हवाली से ऊपर उठकर आधुनिक तकनीक से इसका तत्काल सीमांकन कराए । अतिक्रमण हटाकर इस तालाब का जीर्णोद्धार और सुंदरीकरण करना केवल पर्यावरण की रक्षा नहीं, बल्कि माचलपुर के सुरक्षित भविष्य की गारंटी है,अब खोखले आश्वासनों की नहीं धरातल पर सख्त प्रशासनिक हथौड़े की जरूरत है ।

“शासन स्तर से बजट की स्वीकृति का भरोसा दिया विधायक दांगी ने”

विधायक हजारीलाल दांगी ने परिषद की बैठक में उपस्थित रहकर बड़े तालाब बाघा बाल्डी के सौंदर्यीकरण के लिए ₹2.5 करोड़ के भारी-भरकम प्रस्ताव को परिषद से हरी झंडी दिलवाई साथ ही, विधायक ने आश्वस्त किया कि वे स्वयं राज्य सरकार के संबंधित विभाग से संपर्क कर इस बजट को जल्द से जल्द मंजूर कराने का प्रयास करेंगे ।

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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