
महिला एवं बाल विकास विभाग में CSR फंड की खरीदीपर उठे गंभीर सवाल, सजग पत्रकार ने कलेक्टर के नाम सौंपा सबूतों से भरा पुलिंदा, निष्पक्ष जांच की मांग ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
राजगढ़:- नौनिहालों और गर्भवती महिलाओं के विकास के लिए आने वाले फंड में राजगढ़ के भीतर एक बड़े ‘खेल’ की बू आ रही है। महिला एवं बाल विकास विभाग द्वारा कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) मद से की गई 1 करोड़ 26 लाख 37 हजार 800 रुपये की महा-खरीदी अब संदेह के घेरे में है। इस पूरे मामले में वित्तीय अनियमितता और भ्रष्टाचार की आशंका जताते हुए जिले के सजग पत्रकार रामबाबू गौड़ ने कलेक्टर गिरीश कुमार मिश्रा के नाम एक शिकायती आवेदन अपर कलेक्टर प्रताप सिंह चौहान को सौंपा है। आवेदन के साथ संलग्न दस्तावेज चीख-चीखकर कह रहे हैं कि सरकारी और कॉर्पोरेट पैसे का किस तरह मखौल उड़ाया गया है ।
“महा-घोटाले का गणित: ₹600 की चीज ₹1977 में” !
जांच की मंगकर्ता गौड़ के पास उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार, इस पूरे खेल की कड़ियां बाजार भाव से मेल नहीं खा रही हैं। बिलों में जो सबसे चौंकाने वाली बात सामने आई है, वह इस प्रकार है:
ग्रीन बोर्ड का ‘जादू’: आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए 2×3 आकार के जो ग्रीन बोर्ड खरीदे गए, उनकी कागजी कीमत 1,977 रुपये प्रति नग दर्शाई गई है ।
बाजार की हकीकत : स्थानीय बाजार में ठीक इसी साइज और क्वालिटी का बेहतरीन ग्रीन बोर्ड महज 600 रुपये में आसानी से मिल जाता है ।
सीधा सवाल: आखिर किसके इशारे पर एक अदद बोर्ड पर तिगुनी से ज्यादा कीमत चुकाकर बजट को ठिकाने लगाया गया ?
📋 CSR फंड से हुई ‘कागजी’ खरीदी का पूरा ब्योरा:
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• सैमसंग 43 इंच एलईडी टीवी : 350 नग
• इलेक्ट्रॉनिक पंखे : 350 नग
• डेटा स्टोरेज पेन ड्राइव : 350 नग
• एजुकेशनल ग्रीन बोर्ड : 350 नग
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कुल बजट स्वाहा: ₹1,26,37,800 (एक करोड़ छब्बीस लाख+)
“ग्राउंड जीरो का सच: ‘कागज पर सप्लाई, मौके पर सफाई” !’
इस पूरे मामले की सबसे गंभीर कड़वी सच्चाई तब सामने आई जब पत्रकार रामबाबू गौड़ ने खुद जमीन पर उतरकर इसकी पड़ताल की । उन्होंने जिले के 350 आंगनवाड़ी केंद्रों में से केवल 7 केंद्रों का औचक निरीक्षण (फिजिकल वेरिफिकेशन) किया ।
नतीजा बेहद चौंकाने वाला रहा : इन सातों केंद्रों पर वह सामान अपेक्षित रूप से मौजूद ही नहीं मिला, जिसे कागजों में डिलीवर दिखाया जा चुका है ।
हालांकि, शिकायतकर्ता ने परिपक्वता दिखाते हुए आवेदन में साफ किया है कि चूंकि यह पड़ताल अभी बेहद सीमित (सिर्फ 7 केंद्रों) स्तर पर हुई है, इसलिए सीधे किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी । लेकिन जो शुरुआती साक्ष्य और गायब सामान की तस्वीरें सामने आई हैं, वे एक स्वतंत्र और उच्च स्तरीय जांच के लिए पर्याप्त हैं ।
“इन 3 कड़े बिंदुओं पर टिकी है जांच की मांग”
अपर कलेक्टर को सौंपे गए इस शिकायती आवेदन के बाद अब जिला प्रशासन के पाले में गेंद है,आवेदन में मुख्य रूप से तीन बड़ी मांगें की गई हैं !
शत-प्रतिशत भौतिक सत्यापन: जिले के सभी 350 आंगनवाड़ी केंद्रों की मौके पर जाकर जांच हो कि सामान वहां पहुंचा भी है या नहीं ।कागजातों की स्क्रूटनी: खरीदी से जुड़े हर एक बिल, वेंडर कोटेशन, टेंडर प्रक्रिया और सप्लायर के दस्तावेजों की बारीकी से फोरेंसिक जांच हो ।
दोषियों पर सख्त एक्शन: इस करोड़ों के घालमेल के पीछे जो भी सफेदपोश अधिकारी या रसूखदार सप्लायर शामिल हैं, उन पर एफआईआर दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।अब नजरें प्रशासन पर है नौनिहालों के भविष्य को संवारने के नाम पर आए 1.26 करोड़ रुपये के इस कथित बजट-भक्षण मामले में कलेक्टर गिरीश कुमार मिश्रा क्या कड़ा रुख अपनाते हैं, या ठंडे बस्ते में जाता है ? इस पर पूरे जिले की नजरें टिकी हुई हैं ।










