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पांच सौ वर्षों के इतिहास का गौरव: बीहड़ जंगल से भव्य धाम बनी माँ जालपा सिद्धपीठ,आधुनिक सुविधाओं से दर्शन हुए सुगम !

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भक्त ज्वालानाथ की तपस्या से प्रकट हुई थीं सिंह-वाहिनी माँ,भील राजाओं के काल से जुड़ा है गहरा नाता ।

घनश्याम शर्मा माचलपुर

राजगढ़ / माचलपुर :- राजगढ़ जिला मुख्यालय से महज 4 किलोमीटर दूर राष्ट्रीय राजमार्ग 52 (भोपाल-जयपुर मार्ग) के समीप स्थित प्राचीन सिद्धपीठ माँ जालपा मंदिर में श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक विकास कार्य किए गए हैं । हरित पहाड़ी पर स्थित इस पावन धाम में अब भक्तों के लिए भव्य गर्भगृह,सर्वसुविधायुक्त सामुदायिक भवन और पक्के मार्गों का निर्माण किया गया है,इन नई व्यवस्थाओं के चलते अब प्रतिदिन आने वाले हजारों दर्शनार्थियों को सुगमता से दर्शन मिल रहे हैं और बुजुर्ग व महिला श्रद्धालुओं को भी पहाड़ी पर पहुँचने में आसानी हो रही है ।

“भक्त ज्वालानाथ की तपस्या से प्रकट हुई थीं माँ”
स्थानीय प्रामाणिक मान्यताओं और किदवंती अनुसार, इस सिद्धपीठ की स्वयंभू प्रतिमा का इतिहास करीब 1100 साल पुराना माना जाता है । कहा जाता है कि सदियों पहले इस पहाड़ी पर भक्त ज्वालानाथ ने माता की कठिन आराधना की थी,उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर जगत जननी ने उन्हें दर्शन दिए,जिसके बाद यहाँ एक पीपल के पेड़ के नीचे माता की दिव्य मूर्ति प्राप्त हुई थी । पहाड़ी पर पाषाण से निर्मित माँ की इस अलौकिक सिंह-वाहिनी प्रतिमा की स्थापना सबसे पहले एक चबूतरे पर की गई थी ।

“500 साल से भी पहले भील राजाओं ने शुरू की थी नियमित पूजा”
इतिहासकारों के अनुसार, लगभग 500 वर्ष से अधिक समय पूर्व जब राजगढ़ पर भील शासकों का शासन था, तब इस मंदिर में नियमित पूजा-अर्चना और चबूतरे का जीर्णोद्धार हुआ । भील राजा, माता के परम उपासक थे समय बीतने के साथ यह स्थान उमट एवं परमार राजवंश की कुलदेवी के रूप में प्रतिष्ठित हुआ आधुनिक समय में प्रशासनिक सहयोग से इसे एक धार्मिक ट्रस्ट घोषित किया गया, जिसके बाद कलेक्टर व मंदिर समिति की देखरेख में टेकरी पर सड़क मार्ग, सीढ़ियाँ, बिजली और पेयजल जैसी व्यवस्थाएं चाक-चौबंद की गईं ।

“कभी दुर्गम था रास्ता, दिन में भी जाने से डरते थे लोग”
बुजुर्गों के अनुसार, एक दौर ऐसा भी था जब इस ऊँची पहाड़ी पर जाना बेहद जोखिम भरा था । यह पूरी टेकरी घने बीहड़ जंगलों से घिरी हुई थी,जहाँ हिंसक वन्य जीवों का बसेरा रहता था, माता के दर्शनों के लिए भक्तों को पथरीले और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से रेंगते हुए जाना पड़ता था,जिससे दिन में भी लोग अकेले जाने से कतराते थे । लेकिन आज माँ के आशीर्वाद से इसी वीरान पहाड़ी पर साल के बारह महीने श्रद्धालुओं का ताँता लगा रहता है, नेवज नदी के शांत तट और प्राकृतिक सौंदर्य के बीच स्थित यह परिसर आज सामाजिक समरसता का गौरवशाली प्रतीक बन चुका है ।

“माँ जालपा के दिव्य रहस्य और परंपराएं”

उल्टा स्वास्तिक बनाने की परंपरा: मंदिर से जुड़ी एक और गहरी आस्था है कि यहाँ देवी के दरबार में अपनी मनोकामना लेकर आने वाले भक्त मंदिर की दीवार पर उल्टा स्वास्तिक बनाते हैं । मन्नत पूरी होने के बाद भक्त पुनः पहाड़ी पर आकर सीधा स्वास्तिक बनाकर माता का आभार जताते हैं।
बिना मुहूर्त के पांती विवाह: जालपा माता मंदिर की सबसे अनूठी परंपरा यहाँ होने वाले “पांती” विवाह हैं । जब किसी युवक-युवती की शादी के लिए कोई ज्योतिषीय मुहूर्त नहीं निकलता, तो माता की साक्षी में ‘पांती’ रखकर विवाह संपन्न कराया जाता है। स्थानीय मान्यता है कि माता का आशीर्वाद ही सबसे बड़ा और अचूक मुहूर्त है ।
चार राज्यों से उमड़ती है भारी भीड़: चैत्र और शारदीय नवरात्रि के दौरान माँ जालपा धाम एक विशाल उत्सव का रूप ले लेता है । यहाँ आयोजित होने वाले भव्य मेले में न केवल मध्य प्रदेश और पड़ोसी राज्य राजस्थान, बल्कि महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश से भी लाखों श्रद्धालु मन्नतें लेकर पहुँचते हैं ।

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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