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अनंत शक्ति स्वरूपा माँ बीजासन की प्रामाणिक गाथा,राजगढ़ की पावन धरा पर जाग्रत’भक्ति का महादुर्ग’ भैंसवा माता धाम !

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“सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके । शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणी नमोऽस्तुते॥”

घनश्याम शर्मा माचलपुर

माचलपुर :- प्रशासन की आधिकारिक जानकारी के अनुसार,अंचल की सुरम्य पहाड़ियों पर स्थित भैंसवा माता मंदिर केवल जनश्रुतियों पर नहीं,बल्कि सदियों पुराने प्रामाणिक इतिहास और अटूट श्रद्धा पर टिका एक जाग्रत शक्तिपीठ है । सारंगपुर तहसील के अंतर्गत सांडावता राष्ट्रीय राजमार्ग से लगभग 19 किलोमीटर की दूरी पर स्थित यह पावन धाम साक्षात माँ बीजासन का वह अलौकिक दरबार है, जहाँ 400 से अधिक वर्षों से अनवरत पूजा अर्चना की प्राचीन परंपराएं चली आ रही हैं । लगभग 200 एकड़ में फैली इस विशाल पहाड़ी की चोटी पर स्थित मंदिर को श्रद्धालु आज भी एक ऐसे सिद्ध क्षेत्र के रूप में पूजते हैं,जहाँ माँ ने अपने बाल स्वरूप में लीलाएं रची थीं और भक्तों के कष्टों का निवारण करने के लिए स्वयं इस धरा पर प्रतिष्ठित हुई थीं।

त्रिलोकतारिणी का अलौकिक कौतुक और ‘दूधतलाई’ की प्रामाणिक कथा”
नमो नमो दुर्गे सुख करनी। नमो नमो अम्बे दुःख हरनी॥”
ऐतिहासिक और लोक मान्यताओं के अनुसार,इस सिद्ध पीठ की स्थापना राजस्थान के सुप्रसिद्ध कबीला नायक लाखा बंजारा और महाशक्ति के बाल स्वरूप के मिलन से जुड़ी है । मान्यताओं के अनुसार,प्राचीन काल में लाखा बंजारा जब अपने पशुओं को चराने के लिए भैंसवा की विस्तृत पहाड़ियों पर आया करते थे,तब उन्हें यहाँ एक अनाथ और रोती हुई दिव्य कन्या मिली,जिसे उन्होंने अपनी पुत्री मानकर स्नेहपूर्वक पाला । वह कन्या जब अन्य ग्वालों के साथ वन में पशु चराने जाती थी,तो एक विस्मयकारी घटना घटित होती थी । अन्य ग्वाले जहाँ दूर जलाशय पर पशुओं को पानी पिलाने जाते थे, वहीं वह दैवीय बालिका कबीले के मुख्य जलाशय के समीप स्थित एक छोटी सी तलाई (तालाब) के पास जाती थी,जहाँ उसका जल माँ की कृपा से स्वत ही परम पवित्र श्वेत दुग्ध में परिवर्तित हो जाता था । जब पिता लाखा बंजारा को ग्वालों के माध्यम से इस अलौकिक रहस्य का पता चला और उन्होंने स्वयं अपनी आँखों से इस कौतुक को देखा,तो वह बालिका लोक मर्यादा के कारण उसी क्षण भूमि खंड को चीरती हुई साक्षात धरती माता की गोद में समा गई । इसके पश्चात उसी स्थल से देवी माँ का प्राकट्य हुआ, जिसे संपूर्ण अंचल में ‘भैंसवा माता’ के नाम से पूजा जाने लगा और वह पावन जलाशय आज भी ‘दूधतलाई’ के नाम से श्रद्धा का केंद्र बना हुआ है,जिसके जल के विषय में मान्यता है कि यह नवजात शिशुओं की माताओं के स्वास्थ्य विकारों को दूर करता है ।

“अचल पर्वत पर महामाया का अभेद्य साम्राज्य और मन्नत का ‘उल्टा स्वस्तिक”

“तू ही जगदम्बा और भवानी। महिमा तेरी सब जग ने मानी॥”
समय के साथ बंजारा कबीले की वह ऐतिहासिक पड़ाव स्थली आज मध्य प्रदेश शासन के राजगढ़ जिला कलेक्टर की अध्यक्षता वाले एक प्रतिष्ठित शासकीय मंदिर ट्रस्ट द्वारा संचालित एक विशाल और सुव्यवस्थित तीर्थस्थल में परिवर्तित हो चुकी है । विंध्याचल पर्वत श्रृंखला की मनोरम ऊंचाइयों पर स्थित इस मंदिर को भक्तगण प्रेम से ‘भक्ति का दुर्ग’ कहते हैं क्योंकि यहाँ पहुँचते ही आध्यात्मिक शांति और अलौकिक सकारात्मक ऊर्जा का प्रत्यक्ष अनुभव होता है । इस शक्तिपीठ की एक अत्यंत प्रामाणिक है कि संतान प्राप्ति की इच्छा रखने वाले दंपति यहाँ आकर श्रद्धा पूर्वक मंदिर की दीवारों पर उल्टा स्वस्तिक बनाते हैं । जब माता रानी की अनुकंपा से उनकी मनोकामना पूर्ण हो जाती है,तो वे अपनी मन्नत पूरी होने के साक्ष्य स्वरूप मंदिर परिसर में आकर बच्चों का ‘पालना'(झूला) अर्पित करते हैं, जिसके कारण आज भी मैया के दरबार में अनगिनत पालने बंधे हुए दिखाई देते हैं जो इसकी जीवंत प्रामाणिकता को सिद्ध करते हैं ।

“राज-राजेश्वरी की माघ पूर्णिमा पालकी यात्रा और ऐतिहासिक पशु मेला”

“जग जननी जय जय जगदम्बा। संकट काटो बिना विलंबा॥”
भैंसवा माता धाम की सबसे भव्य और ऐतिहासिक सांस्कृतिक परंपरा प्रत्येक वर्ष माघ मास में आयोजित होने वाले विशाल उत्सव से जुड़ी है। आधिकारिक राजकीय विवरणों के अनुसार,यहाँ बसंत पंचमी से लेकर माघ पूर्णिमा तक एक महीने का सुप्रसिद्ध पारंपरिक पशु मेला आयोजित किया जाता है, जो संपूर्ण मालवा अंचल की व्यापारिक और सांस्कृतिक रीढ़ है । इस मेले के भव्य समापन अवसर यानी माघ पूर्णिमा की रात्रि को माँ बीजासन की अष्टधातु की पावन और दिव्य प्रतिमा को पहाड़ी के मुख्य गर्भगृह से उतारकर पूर्ण राजसी वैभव के साथ रत्नों से सुसज्जित पालकी में विराजमान किया जाता है । इसके बाद मैया की यह पालकी ग्राम भैंसवामाता के समस्त देवस्थानों और छोटे मंदिरों से होते हुए संपूर्ण क्षेत्र का नगर भ्रमण करती है । यह पालकी यात्रा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि संपूर्ण क्षेत्र के ग्रामीण समाज को आपसी समरसता,अखंड भाईचारे और सनातन धर्म की अटूट डोर में पिरोने वाला एक विशाल महा-अनुष्ठान है, जिसमें हजारों-लाखों श्रद्धालु सम्मिलित होकर गगनभेदी जयकारों से संपूर्ण धरा को गुंजायमान कर देते हैं ।

“चैत्र व अश्विन नवरात्रि का महाकुंभ और मंदिर का आधुनिक विस्तार”

“दुर्गे शक्ति स्वरूपा माता। तुम ही जग की भाग्य विधाता॥”
सनातन धर्म में शक्ति की उपासना के परम पावन पर्व चैत्र नवरात्रि और अश्विन नवरात्रि के अवसरों पर भैंसवा माता धाम का वैभव अपने चरमोत्कर्ष पर होता है । इन पावन नौ दिनों में मंदिर में सुबह 6:00 बजे की मंगला आरती और सूर्यास्त के पश्चात होने वाली संध्या आरती के समय भक्तों की अपार भीड़ उमड़ती है, जिसके कारण पूरा क्षेत्र अखंड ज्योति और दुर्गा सप्तशती के सस्वर पाठ से गुंजायमान रहता है । इसके साथ ही,यहाँ 108 कुंडीय शतचंडी महायज्ञ और विशाल चुनर यात्राओं का भव्य आयोजन नियमित रूप से होता है । मध्य प्रदेश शासन और आधिकारिक बिजासन धाम ट्रस्ट द्वारा लगातार बढ़ती श्रद्धालु संख्या को देखते हुए मंदिर परिसर का भव्य और वृहद विस्तार किया गया है । वर्तमान में मंदिर की पहाड़ियों को आधुनिक रूप से विकसित कर भक्तों के ठहरने के लिए धर्मशालाएं, सुंदर बगीचे,पेयजल सुविधाएं और सुगम विद्युत व्यवस्था सुनिश्चित की गई है, ताकि देश के कोने-कोने से आने वाले मैया के लाडले भक्तों को माँ बीजासन के सुगम,सुरक्षित और परम दिव्य दर्शन प्राप्त हो सकें ।

बोलिए भैंसवा वाली मैया की… जय ! साक्षात माँ बीजासन सरकार की… जय !

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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