राजगढ़ जिले में अधिकारी खत्री की सक्रियता से बढ़े छापों के आंकड़े; जनता पूछ रही- महीनों बाद आने वाली लैब रिपोर्ट का आज तक हुआ क्या ?
घनश्याम शर्मा माचलपुर
माचलपुर / राजगढ़ :- जिला मुख्यालय से लेकर तहसीलों के बस स्टैंडों तक इन दिनों खाद्य सुरक्षा विभाग की गाड़ियां और अफसरों की दौड़-भाग खूब दिखाई दे रही है । जब से खाद्य सुरक्षा अधिकारी एस.एस. खत्री ने जिले की कमान संभाली है, निरीक्षण और सैंपल (नमूने) कलेक्ट करने का सिलसिला रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। पचोर के मावा भंडार से लेकर खिलचीपुर की डेयरियों और ब्यावरा जीरापुर के होटलों तक, विभाग के पास हर दिन ‘सैंपलिंग’ का एक नया आंकड़ा होता है । लेकिन इस पूरी कवायद के पीछे का कड़वा सच यह है कि आज तक आम जनता को यह नहीं पता चला पाया कि इनमें से कितने सैंपल फेल हुए और किस मिलावटखोर को सलाखों के पीछे भेजा गया ?
“रिपोर्ट आने की कछुआ चाल: त्योहार बीत जाते हैं, रिपोर्ट नहीं आती”
विभागीय सूत्रों और जागरूक नागरिकों का कहना है कि त्योहार आते ही प्रशासन ‘सैंपलिंग अभियान’ का ढोल पीटना शुरू कर देता है। अधिकारियों का रटा-रटाया बयान होता है—”सैंपल को राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशाला भोपाल भेजा जा रहा है, रिपोर्ट आने पर नियमानुसार कार्रवाई होगी।”
लेकिन सवाल यह है कि भोपाल लैब से रिपोर्ट आने में 3 से 6 महीने का समय लग जाता है । तब तक दुकानदार वही संदिग्ध माल जनता को खिलाकर मुनाफा कूट चुका होता है, मजे की बात यह है कि जब महीनों बाद रिपोर्ट आती भी है, तो उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया जाता है । विभाग कभी सार्वजनिक तौर पर यह जारी नहीं करता कि जिले के अमुक बड़े होटल या नामचीन डेयरी का सैंपल फेल पाया गया है, ताकि जनता वहां से खरीदारी बंद कर सके ।
“कार्रवाई का विरोधाभास: केवल ‘प्रेस नोट’ चमकाने की कवायद”?
हाल ही में जीरापुर में हुई कार्रवाई इसका सबसे बड़ा उदाहरण है,जहां अधिकारी ने मौके पर ही 10 किलो तेल को खराब मानकर फिकवा दिया, पूर्व ऐसा ब्यावरा में भी हुआ । पत्रकारिता और कानून के जानकारों का कहना है कि यदि अधिकारी को मौके पर ही यह समझ आ गया था कि तेल खराब है,तो मामला वहीं ‘सैंपल-सैंपल’ खेलने के बजाय तुरंत चालान या कोर्ट की कार्रवाई की तरफ क्यों नहीं बढ़ा ? और अगर तेल खराब होने का अंतिम फैसला लैब रिपोर्ट को करना है, तो बिना रिपोर्ट आए व्यापारी का माल नष्ट कराने का अधिकार अधिकारी को किसने दिया ? यह विरोधाभास साफ दिखाता है कि पूरी कार्रवाई सिर्फ अखबारी सुर्खियां बटोरने और कागजी आंकड़े दुरुस्त करने के लिए की जा रही है ।
“जांच की कमियां बनती हैं मिलावटखोरों का कवच”
एक रिपोर्ट के अनुसार, पूरे मध्य प्रदेश में खाद्य सुरक्षा के मामलों में सजा की दर बेहद निराशाजनक है । इसका मुख्य कारण कानूनी और प्रक्रियात्मक कमियां हैं वरिष्ठ वकीलों का मानना है कि सैंपलिंग के समय की गई प्रक्रियात्मक गलतियां,देरी से आने वाली लैब रिपोर्ट और मजबूत पैरवी न होने के कारण ज्यादातर रसूखदार मिलावटखोर कोर्ट से आसानी से बरी हो जाते हैं ।
राजगढ़ की जनता अब केवल ‘सैंपलिंग के फोटो’ देखकर थक चुकी है । उपभोक्ताओं की मांग है कि कलेक्टर डॉ. मिश्रा को विभाग से यह रिपोर्ट तलब करनी चाहिए कि पिछले एक साल में अधिकारी द्वारा लिए गए दर्जनों सैंपलों में से कितनों की रिपोर्ट आई, कितने फेल हुए और दोषियों पर असल में क्या कानूनी डंडा चला ? वरना,यह पूरी कवायद सिर्फ और सिर्फ एक प्रशासनिक खानापूर्ति बनकर रह जाएगी।









