पिया के नाम की मेहंदी और 16 श्रृंगार से महका नगर, द्रौपदी और मां पार्वती के पावन संकल्प की यादें हुईं ताजा,श्रद्धा के आगे झुका आसमान ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
माचलपुर :- नगर में पारंपरिक हर्षोल्लास और गहरी धार्मिक आस्था के साथ सुहागिन महिलाओं ने अखंड सौभाग्य का महापर्व करवा चौथ मनाया। भोर की पहली किरण के साथ शुरू हुआ यह कठिन व्रत देर रात चंद्र दर्शन और अर्घ्य दान के साथ संपन्न हुआ नगर के विभिन्न वार्डों और मोहल्लों में सुबह से ही उत्सव का माहौल नजर आया । रंग बिरंगे पारंपरिक परिधानों,16 श्रृंगार और हाथों में रची पिया के नाम की मेहंदी सजाए महिलाएं भारतीय संस्कृति के इस सबसे खूबसूरत उत्सव का हिस्सा बनीं ।
“धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन कथाओं का अनूठा संगम”
इस पावन व्रत के पीछे गहरी धार्मिक मान्यताएं छिपी हुई हैं, जो सदियों से भारतीय समाज में वैवाहिक जीवन की नींव को मजबूती दे रही हैं । मान्यताओं के अनुसार, महाभारत काल में जब पांडव अर्जुन तपस्या करने नीलगिरि के पर्वतों पर गए थे और बाकी पांडव संकट में थे,तब भगवान श्रीकृष्ण के परामर्श पर द्रौपदी ने भी इसी करवा चौथ व्रत को पूर्ण विधि विधान से रखा था, इस व्रत के पुण्य प्रताप से ही पांडवों के जीवन पर आया हर संकट दूर हो गया था ।
वहीं, पौराणिक आख्यानों में मां पार्वती द्वारा भगवान शिव को पति रूप में पाने और उनके कल्याण के लिए किए गए तप को भी इस व्रत की मूल प्रेरणा माना जाता है । नगर के पंडितों के अनुसार, ‘करवा’ यानी मिट्टी का पात्र, जिसे साक्षात गणेश जी का स्वरूप मानकर पूजा जाता है, जीवन में विघ्नों का नाश करता है और पति-पत्नी के रिश्ते को अटूट बनाता है ।
“सामूहिक कथा और चंद्रदर्शन की अनूठी छटा”
शाम के समय नगर के विभिन्न मंदिरों और घरों के आंगनों में सामूहिक पूजा के आयोजन हुए। सुहागिनों ने एक साथ बैठकर करवा चौथ की पौराणिक कथा सुनी, जिसमें छलनी से चांद देखने और करवा बदलने की रस्म को पूरी श्रद्धा के साथ निभाया गया। मां चौथ माता से सभी ने अपने सुहाग की रक्षा और परिवार की समृद्धि का आशीर्वाद मांगा ।
“प्रेम और विश्वास की नई इबारत”
रात को जैसे ही गगन मंडल पर चंद्रदेव उदित हुए, हर तरफ उत्साह की लहर दौड़ गई । महिलाओं ने छलनी की ओट से पहले चंद्रमा को निहारा,फिर अपने पति का चेहरा देखकर उनके हाथों से जल ग्रहण किया, इस अलौकिक दृश्य ने आधुनिकता के दौर में भी सनातन परंपराओं की अटूट शक्ति को एक बार फिर साबित कर दिया कि प्रेम और त्याग की इस पावन धरा पर आज भी हमारी सांस्कृतिक विरासत उतनी ही जीवंत है, जितनी सदियों पहले थी । अंततः, ढोल-धमाकों और सुहागी गीतों की गूंज के साथ माचलपुर में यह अलौकिक पर्व अटूट प्रेम और विश्वास की एक नई इबारत लिखकर संपन्न हुआ ।









