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प्रशासनिक तमाशा: जब ज़हर मानकर तेल फिंकवा दिया, तो अब कौन सी ‘पवित्र’ रिपोर्ट का इंतज़ार है ?

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आँखों देखी पर भरोसा नहीं, भोपाल की लैब से महीनों बाद आने वाली कागजी गवाही के भरोसे बैठा सिस्टम ।

घनश्याम शर्मा माचलपुर

माचलपुर/ राजगढ़ :- नरसिंहगढ़ में खाद्य सुरक्षा विभाग की कार्रवाई ने एक बार फिर सरकारी तंत्र की उस अजीबो गरीब कार्यप्रणाली को उजागर कर दिया है,जो आम जनता की समझ से परे है । सांवलिया स्वीट्स की कड़ाही में खौल रहे जिस 20 किलो तेल को खाद्य सुरक्षा अधिकारी ने अपनी आँखों से ‘खराब और सेहत के लिए ज़हर’ माना और मौके पर ही नष्ट करवा दिया,अब उसी मामले में विभाग कह रहा है कि—”सैंपल की जांच रिपोर्ट आने के बाद नियमानुसार कार्रवाई होगी।”

यह बयान सुनते ही माथा ठनक जाता है । जनता पूछ रही है कि जब तेल को आपने खुद गलत मानकर ज़मीन पर बहा दिया,तो अब लैब में किस बात की गवाही ढूँढी जा रही है ? क्या नष्ट किया गया तेल अधिकारी के विवेक पर फेंका गया था या वह वाकई नियमों के खिलाफ था ?

“ऐसी कार्यवाही विभागीय सिस्टम पर संदेह पैदा करती”

यह दोहरी कार्यप्रणाली ही प्रशासनिक कार्रवाई की नीयत पर गंभीर संदेह खड़ा करती है। इसके पीछे दो ही बातें हो सकती हैं:
1. कानून का मकड़जाल: या तो हमारा ‘खाद्य सुरक्षा अधिनियम’ इतना पंगु है कि वह अधिकारी की आँखों देखी गवाही और मौके पर किए गए एक्शन को कानूनी सबूत नहीं मानता । जब तक भोपाल की लैब से महीनों बाद ठप्पे वाली रिपोर्ट नहीं आएगी, तब तक मिलावटखोर कानूनी रूप से ‘बेदाग’ रहेगा ।
2. दबाव या ‘मैनेजमेंट’ का खेल: या फिर यह रिपोर्ट का इंतज़ार सिर्फ एक ‘सुरक्षित रास्ता’ है । सैंपल लैब में जाएगा, रिपोर्ट आने में 1 से 2 महीने लगेंगे, तब तक त्योहार निकल जाएंगे, जनता मामला भूल जाएगी और पर्दे के पीछे ‘सेटिंग-गेटिंग’ का खेल आसानी से पूरा हो जाएगा ।

“जब सबूत ही नष्ट कर दिया, तो जांच किस बात की” ?

तकनीकी रूप से एक और हास्यास्पद स्थिति पैदा होती है। कानून कहता है कि किसी भी कार्रवाई के लिए मुख्य सबूत का होना जरूरी है। अधिकारियों ने 20 किलो तेल तो मौके पर ही नष्ट करवा दिया अब अगर कल को दुकानदार कोर्ट में मुकर जाए कि उसका तेल बिल्कुल सही था और अधिकारी ने जबरदस्ती फेंकवाया, तो विभाग के पास कोर्ट में पेश करने के लिए कड़ाही वाला तेल तो बचा ही नहीं ! सिर्फ एक छोटा सा सैंपल बचा है, जिसकी रिपोर्ट को मैनिपुलेट करना बेहद आसान होता है।

“कब बदलेगा खाद्य विभाग का यह ढर्रा”?

अगर अधिकारी के पास मौके पर तेल नष्ट करवाने का अधिकार है, तो उसी वक्त दुकान को सील करने, भारी-भरकम ‘ऑन द स्पॉट’ जुर्माना ठोकने और लाइसेंस सस्पेंड करने का अधिकार क्यों नहीं है ? जब तक ‘ऑन द स्पॉट’ सजा का प्रावधान नहीं होगा, तब तक यह औचक निरीक्षण सिर्फ एक ‘विभागीय औपचारिकता’ और फोटो खिंचवाने का माध्यम बने रहेंगे, जनता की सेहत से खिलवाड़ करना बंद होना चाहिए ।

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

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