Edition

कृतज्ञता का महापर्व पितृ पक्ष: केवल कर्मकांड नहीं, हमारी जड़ों से जुड़ने का उत्सव !

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

सनातन ग्रंथों के अकाट्य प्रमाणों,महाभारत के प्रसंगों और आध्यात्मिक विज्ञान के आलोक में जानिए तर्पण, पंचबली एवं पितृ ऋण से मुक्ति का वास्तविक विधान ।

घनश्याम शर्मा माचलपुर

माचलपुर :- हमारी सनातन संस्कृति में कृतज्ञता को जीवन का सबसे बड़ा गुण माना गया है हम आज जो कुछ भी हैं—हमारा यह शरीर, हमारी सोच, हमारे संस्कार और हमारी रगों में दौड़ता लहू—वह सब हमारे पूर्वजों (पितरों) की ही धरोहर है । भाद्रपद मास की पूर्णिमा से आश्विन मास की अमावस्या तक का यह समय, इसी धरोहर के प्रति अपना अगाध प्रेम और आभार व्यक्त करने का पावन काल है । यह केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि अपने अतीत को नमन करने का उत्सव है ।

“श्राद्ध’ यानी श्रद्धा का उत्सव: क्या कहते हैं हमारे शास्त्र” ?

सनातन धर्मग्रंथों में ‘श्राद्ध’ की बड़ी सुंदर परिभाषा दी गई है। मार्कंडेय पुराण के अनुसार, “श्रद्धया कृतं श्राद्धम्“—अर्थात जो कार्य पूरी श्रद्धा,आदर और प्रेम से किया जाए, वही श्राद्ध है । शास्त्र कहते हैं कि हर मनुष्य जन्म के साथ तीन प्रकार के ऋण लेकर आता है: देव ऋण, ऋषि ऋण और पितृ ऋण । पितृ पक्ष वही स्वर्णिम समय है, जब हम तर्पण और दान के माध्यम से अपने ‘पितृ ऋण’ से मुक्त होते हैं ।

जब हम शुद्ध मन से अपने पूर्वजों को याद करते हैं, तो वे सूक्ष्म रूप में हमें दीर्घायु, सुख-समृद्धि, उत्तम स्वास्थ्य और वंश वृद्धि का अटूट आशीर्वाद देकर जाते हैं ।

“जब महादानी कर्ण को भी समझ आया श्राद्ध का मोल”

महाभारत का एक प्रसंग हमें याद दिलाता है कि पितृ पक्ष कितना अनिवार्य है । जब महादानी कर्ण मृत्यु के पश्चात स्वर्ग पहुंचे,तो उन्हें भोजन में केवल सोना और हीरे जवाहरात परोसे गए । व्याकुल होकर कर्ण ने जब यमराज से इसका कारण पूछा,तो यमराज ने कहा—”हे कर्ण ! तुमने जीवन भर दूसरों को केवल सोना दान किया, लेकिन कभी अपने पूर्वजों के नाम पर दो बूंद जल या एक मुट्ठी अन्न का दान नहीं किया ।

तब कर्ण ने कहा कि वे अपने माता-पिता के इतिहास से अनजान थे । इसके बाद,कर्ण को 16 दिनों के लिए पुनः पृथ्वी पर आने की अनुमति मिली, जहाँ उन्होंने अपने पितरों का श्राद्ध कर अन्न-जल का दान किया यही 16 दिन आज पितृ पक्ष के रूप में पूजे जाते हैं ।

“विज्ञान और भावना: कैसे पहुंचता है पितरों तक हमारा भाव” ?

अक्सर आज की युवा पीढ़ी पूछती है कि जो दुनिया छोड़कर जा चुके हैं,उन तक हमारा दिया भोजन या जल कैसे पहुंचेगा ? इसका जवाब हमारे गरुड़ पुराण और आध्यात्मिक विज्ञान में छिपा है । जैसे हम विदेशों में बैठे अपने प्रियजनों को भारतीय मुद्रा भेजते हैं, तो वह वहाँ डॉलर या पाउंड में बदलकर मिलती है ठीक उसी तरह, जब हम यहाँ से श्रद्धापूर्वक नाम और गोत्र का उच्चारण कर तर्पण करते हैं, तो हमारी भावनाएं और भोजन का सूक्ष्म अंश, मंत्रों की ऊर्जा तरंगों में बदलकर पितरों तक उनकी लोक की भाषा में पहुंच जाता है पितर अन्न के भूखे नहीं, हमारे प्रेम और याद के भूखे होते हैं ।

“शास्त्रों के अनुसार: पूर्वजों के निमित्त 5 अनिवार्य कर्तव्य”

मनुस्मृति,विष्णु पुराण और गरुड़ पुराण के अनुसार, इस अवधि में हर सनातनी को ये पांच कार्य अवश्य करने चाहिए :
तिल-जल तर्पण: दक्षिण दिशा की ओर मुख कर, जल में काले तिल और कुशा मिलाकर पितरों को अंजलि दें । विष्णु पुराण के अनुसार काले तिल से पितर परम तृप्त होते हैं।कुतप काल में धूप: दोपहर के आठवें मुहूर्त 11:36 से 12:24 को ‘कुतप काल’ कहते हैं । इस समय दी गई घी-खीर की आहुति सीधे पितर ग्रहण करते हैं ।
पंचबली कर्म: भोजन का प्रथम अंश पांच जीवों—गाय (सात्विकता), कौआ (यमदूत), कुत्ता (रक्षक), चींटी (सूक्ष्म जीव) और देवताओं के लिए अनिवार्य रूप से निकालें ।ब्राह्मण भोजन व दान: विद्वान ब्राह्मण को आदरपूर्वक भोजन कराएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न या वस्त्र का दान करें ।
गीता पाठ: पितरों की आत्म-शांति और मोक्ष के लिए घर में श्रीमद्भागवत गीता के 7वें या 11वें अध्याय का पाठ अवश्य करें ।

“पूर्वज घर की वे मजबूत जड़ें हैं, जिनके बिना हमारे जीवन के पेड़ पर कभी खुशियों के फल नहीं लग सकते। आइए, इन 16 दिनों में अपनी जड़ों को श्रद्धा के जल से सींचें।”

Khushi Samvad
Author: Khushi Samvad

Leave a Comment

और पढ़ें

traffic tail