विद्वान ने कहा – क्रोध की अग्नि को बुझाने के लिए समता का जल चाहिए, भगवान वासुपूज्य का निर्वाण कल्याणक मनाया ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
माचलपुर/ राजगढ़ :- पिछले दस दिनों से चल रहे भाद्रपद के दसलक्षण महापर्व का मंगलवार को विशेष पूजन-विधान, श्रीजी के कलशाभिषेक, शांतिधारा और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के साथ समापन हुआ। इस अवसर पर पीटी कंपनी स्थित श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में श्रद्धालुओं ने आत्मा की शुद्धि, सद्गति और मोक्षमार्ग की प्राप्ति के उद्देश्य से कषाय एवं पापों से निवृत्ति के लिए धर्माराधना की ।
विद्वान सत्येंद्र भारिल्ल ने कहा कि दसलक्षण महापर्व आत्मशुद्धि और आत्मावलोकन का पर्व है। इन दस दिनों में श्रद्धालुओं ने कर्मों की निर्जरा और आत्मबल की वृद्धि के लिए शक्ति के अनुसार व्रत, तप और उपवास किए ।
उन्होंने कहा कि क्रोध की अग्नि को बुझाने के लिए समता का जल आवश्यक है। दसलक्षण धर्म हमें बाहरी आडंबर से अधिक अपने भीतर के कषायों को पहचानने और उन्हें दूर करने की प्रेरणा देता है ।
“प्रतिदिन हुई विशेष शांतिधारा”
दसलक्षण पर्व के दौरान प्रतिदिन सुबह 7:30 बजे श्री मुनिसुव्रतनाथ जिनालय में श्रीजी का कलशाभिषेक एवं विशेष शांतिधारा की गई । सोलहकारण, पंचमेरु,सम्यक् रत्नत्रय और दशलक्षण धर्म की सामूहिक पूजन आयोजित की गई शाम 7:30 बजे मंगल आरती के पश्चात दशलक्षण धर्म पर व्याख्यान हुए । कार्यक्रम में कोषाध्यक्ष आरसी जैन ‘बिजली’ डॉ.पीके जैन, प्रमोद जैन, चंचल जैन, अनिकेत जैन,अन्वय जैन सहित बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे ।
“भगवान वासुपूज्य स्वामी का निर्वाण कल्याणक मनाया”
अंतिम दिन चतुर्दशी को 12वें तीर्थंकर भगवान वासुपूज्य स्वामी का निर्वाण कल्याणक मनाया गया। श्रद्धालुओं ने विधिवत पूजन-अर्चना कर निर्वाण कांड का पाठ किया और भगवान के चरणों में निर्वाण लाडू अर्पित किया ।










