
मंत्री के क्षेत्र खजुरियाघाटा सहित दर्जनों गांवों में फसलों की तबाही से हाहाकार, कलेक्ट्रेट घेराव के बाद भी सो रहा प्रशासन,अब आर-पार के मूड में किसान ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
राजगढ़ / माचलपुर :- जिले के सोयाबीन उत्पादक किसानों पर इस साल कुदरत और बीमारी का ऐसा कहर टूटा है जिसने उनके भविष्य को अंधकार में धकेल दिया है । खेतों में दूर-दूर तक फैली हरी-भरी फसलें अंदर से पूरी तरह खोखली हो चुकी हैं पीला मोजेक और अफलन की जानलेवा जुगलबंदी ने राजगढ़ के सोने जैसी सोयाबीन को कौड़ियों के भाव में बदल दिया है । राज्य मंत्री गौतम टेटवाल के गृह क्षेत्र खजुरियाघाटा सहित आसपास के दर्जनों गांवों में हालात इतने भयावह हैं कि खड़ी फसलों को देखकर किसानों की आंखों में आंसू आ रहे हैं ।
“लागत भी नहीं निकलेगी कर्ज के दलदल में धंसा किसान”
किसानों ने इस उम्मीद में ट्रैक्टर चलाए थे,महंगे बीज खरीदे थे,और कर्ज लेकर दवाइयों का छिड़काव किया था कि इस बार बंपर पैदावार होगी । लेकिन पीला मोजेक वायरस और सोयाबीन के इस गंभीर ‘बांझपन’ ने पौधों से उनका मातृत्व ही छीन लिया है खेतों में स्थिति यह है कि पौधों का विकास तो हुआ और उनका रंग पूरी तरह पीला पड़ गया, मगर उनमें न तो फलियां आईं और न ही दाने पड़े । इस बीमारी के कारण किसानों के खाद, बीज, महंगी दवाइयों और ट्रैक्टर की जुताई का पूरा पैसा मिट्टी में मिल चुका है प्रति एकड़ हजारों रुपये की नगद लागत लगाने के बाद अब किसानों के पास अपनी मजदूरी निकालने के पैसे भी नहीं बचे हैं,दोहरी आर्थिक मार झेल रहा अन्नदाता अब दाने-दाने को मोहताज होने की कगार पर है ।
“कलेक्ट्रेट पर फूटा था गुस्सा, अब फूटा सब्र का बांध”
यह पहली बार नहीं है जब राजगढ़ का किसान सड़कों पर उतरा है । इसी 1 सितंबर को अतिवृष्टि और कीटों के हमले से तबाह हुई फसलों के मुआवजे की मांग को लेकर कलेक्ट्रेट पर प्रदर्शन और घेराव भी किया गया था । लेकिन इस बड़े आक्रोश के बाद भी प्रशासनिक उदासीनता और फाइलों के चक्कर ने किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम किया है । अभी तक जिम्मेदार अधिकारी एसी कमरों से बाहर निकलकर खेतों तक नहीं पहुंचे हैं और जमीनी स्तर पर कोई ठोस सर्वे शुरू नहीं हो सका है खजुरियाघाटा के किसानों योगेश पाल,
धीरप पाल आदि का साफ कहना है कि अगर प्रशासन ने अब भी अपनी कुंभकर्णी नींद नहीं तोड़ी, तो ग्रामीण अंचलों में यह आर्थिक संकट एक बड़े सामाजिक और उग्र आंदोलन का रूप ले लेगा ।
“न्याय की गुहार,इन 3 मोर्चों पर तुरंत राहत की दरकार”
आरबीसी 6-4 के तहत मुआवजा: मुख्यमंत्री राहत कोष और राजस्व पुस्तक परिपत्र (RBC 6-4) के तहत सरकार तुरंत विशेष वित्तीय पैकेज जारी करे और डूबी लागत की भरपाई करे ।
72 घंटे की बाध्यता खत्म करे बीमा कंपनी: पीएम फसल बीमा कंपनियां कागजी दांव-पेंच छोड़कर हर उस पीड़ित किसान को क्लेम दें जिसका खेत बर्बाद हुआ है । नेताओं की घेराबंदी की चेतावनी: जनप्रतिनिधि केवल मंचों से आश्वासन न दें, बल्कि खेतों में आकर इस तबाही का वास्तविक आकलन अपनी आंखों से देखें ।










