— घनश्याम शर्मा ‘माचलपुर’
सूत के कच्चे धागों में सिमटा सदियों का अटूट विश्वास: हैसियत के दौर में दिलों का महापर्व !
बाजारवाद के इस दौर में, जहाँ हर अहसास की एक कीमत तय कर दी गई है और हर रिश्ते को तराजू पर तौला जाने लगा है, वहाँ रक्षाबंधन आज भी हमारी सनातनी संस्कृति की उस आदि-अनंत गर्माहट का अहसास कराता है जो पैसों से नहीं खरीदी जा सकती । यह केवल एक त्योहार नहीं है,यह तो हैसियत और दिखावे की अंधी दौड़ से कोसों दूर, भाई-बहन के दिलों के आत्मिक जुड़ाव का एक ऐसा महापर्व है जिसकी भाषा सिर्फ और सिर्फ मौन स्नेह है ।
सच ही तो है, भाई-बहन के निश्छल प्यार की यह अनमोल धरोहर कभी महँगे उपहारों की मोहताज नहीं रही। एक बहन के लिए उसके भाई की कलाई पर बंधा सूत का वो एक कच्चा धागा दुनिया के सबसे कीमती हीरे-जवाहरात से भी बढ़कर होता है । इस पवित्र रिश्ते की बुनियाद किसी भौतिक वस्तु की चमक पर नहीं, बल्कि एक-दूसरे के प्रति अटूट विश्वास, आदर और उस मूक वादे पर टिकी है, जो बिना कुछ कहे भी सब कुछ कह जाता है ।
आज जब चारों तरफ फिक्स डिपॉजिट, बैंक बैलेंस और उपहारों की कीमत से रिश्तों की गहराई नापी जा रही है, तब हमें यह सोचना होगा कि क्या सच्ची सुरक्षा कभी तिजोरियों की मोहताज होती है ? एक गरीब भाई, जिसके पास अपनी बहन को देने के लिए कोई चमचमाता हुआ कीमती तोहफा नहीं है, लेकिन उसकी आँखों में अपनी बहन के लिए अथाह स्नेह है और वो उसके हर सुख-दुख में एक अभेद्य ढाल बनकर खड़े रहने का जज्बा रखता है
—विश्वास मानिए,उस भाई का वो साथ ही इस ब्रह्मांड का सबसे नायाब और अनमोल उपहार है ।
हमारा इतिहास इस बात का साक्षी है जब भरी सभा में द्रौपदी ने करुणाकर भगवान कृष्ण की घायल उंगली पर अपनी फटी हुई साड़ी का एक छोटा सा,अदना सा टुकड़ा बांधा था,तब उस सूती कपड़े में कोई धन-दौलत या वैभव नहीं छुपा था। उसमें छिपी थी तो बस अगाध श्रद्धा और निश्छल प्रेम की वो अनमोल पूंजी,जिसके कर्ज को चुकाने के लिए स्वयं परमात्मा को अवतार लेना पड़ा । यह पावन पर्व हमें यही तो सिखाता है कि रिश्ते हमेशा दिल की गहराइयों से निभाए जाते हैं, तिजोरी की हैसियत से नहीं। विपरीत परिस्थितियों में एक भाई का अपनी बहन की पीठ पर अदृश्य साया बनकर खड़े रहना ही इस पर्व की असली कमाई है ।
आइए, इस रक्षाबंधन के पुनीत अवसर पर हम सब मिलकर एक संकल्प लें । इस त्योहार को उसकी मूल सादगी,उसकी आदिम पवित्रता की ओर वापस ले चलें । उपहारों की इस कृत्रिम होड़ और सोशल मीडिया के दिखावे से दूर हटकर, एक-दूसरे को केवल और केवल निस्वार्थ प्रेम,असीम सम्मान और अटूट विश्वास भेंट करें ।
यह पर्व हमें एक और गंभीर आत्म-मंथन की प्रेरणा देता है रक्षा का यह संकल्प केवल अपनी सगी बहन की चौखट तक सीमित न रहे ।
जब हमारे भीतर समाज की हर एक महिला की गरिमा, आदर और सुरक्षा के प्रति एक पवित्र सजगता जाग्रत होगी जब हर बेटी खुद को इस समाज में महफूज पाएगी, तभी रक्षाबंधन का यह धागा सही मायनों में सार्थक, समृद्ध और अमर कहलाएगा । माचलपुर सहित संपूर्ण जिले के मेरे आत्मीय पाठकों को, इस पावन और ह्रदयस्पर्शी पर्व की अंतःकरण से अनंत कोटि शुभकामनाएं ! रिश्तों की यह गर्माहट आपके जीवन में सदैव बनी रहे ।










