नगर में बह रही शिव तत्व रसामृत की पीयूष धारा, उज्जैन के प्रख्यात वक्ता पूज्य पंडित श्याम मनावत ने खोला तर्क रूपी सती और श्रद्धा रूपी पार्वती का अनमोल आध्यात्मिक रहस्य ।
घनश्याम शर्मा माचलपुर
माचलपुर :- बजरंग रोड स्थित अग्रवाल धर्मशाला में इन दिनों साक्षात शिवलोक सा दिव्य वातावरण निर्मित हो गया है,जहाँ भक्ति,भाव और ज्ञान की अविरल त्रिवेणी बह रही है । स्व. सेठ राधाकिशन गोयल की पावन पुण्य स्मृति में मुख्य यजमान अरुण कुमार गोयल एवं द्वारा इस भव्य ‘श्री शिव महापुराण कथा’ का मांगलिक आयोजन किया जा रहा है । कथा के दूसरे दिन पंडाल श्रद्धालुओं से खचाखच भरा नजर आया उज्जैन से पधारे सुप्रसिद्ध कथा प्रवक्ता पंडित श्री श्याम मनावत ने जब अपनी ओजस्वी और सुमधुर वाणी से शिव तत्व चिंतन का गरिमापूर्ण प्रवाह शुरू किया, तो समूचा क्षेत्र शिवमय हो उठा । पंडित ने माता सती के चरित्र के गूढ़ प्रसंगों के माध्यम से मानव जीवन को झक झोरने वाला ऐसा अनुपम व्यावहारिक दर्शन प्रस्तुत किया,जिसे सुनकर पंडाल में उपस्थित सैकड़ों प्रबुद्ध श्रोता भाव-विभोर हो उठे ।
“वैचारिक सूत्र,तर्क है सती और श्रद्धा है”
पार्वती व्यास पीठ से अध्यात्म का गूढ़ रहस्य उजागर करते हुए पंडित जी ने कहा कि भगवान शिव के जीवन के प्रसंग केवल पौराणिक कथाएं नहीं, बल्कि आधुनिक जीवन को सही दिशा दिखाने वाला विज्ञान हैं । उन्होंने बहुत ही सरल शब्दों में समझाया :
राजा दक्ष (बुद्धि के प्रतीक) राजा दक्ष साक्षात मानव बुद्धि के अहंकार और गर्व के प्रतीक हैं ।
देवी सती (तर्क का स्वरूप): चूंकि बुद्धि से हमेशा ‘तर्क’ का जन्म होता है, इसलिए राजा दक्ष की पुत्री माता सती तर्क स्वरूप हैं ।
तर्क से कुतर्क की यात्रा: जीवन में किसी विषय या बात पर तर्क उठना स्वाभाविक है । परंतु, जब तर्क किसी समाधान को खोजने के बजाय हठ पकड़ लेता है,तो वह वितर्क बन जाता है, यही वितर्क आगे चलकर कुतर्क का रूप ले लेता है, जो मनुष्य के आत्मिक विनाश का कारण बनता है ।
“सती रूपी ‘तर्क’ से हुए जीवन के सात महाअपराध”
पंडित जी ने माता सती के जीवन काल का उदाहरण देते हुए बताया कि जब मनुष्य का तर्क हठ में बदलकर कुतर्क बन जाता है, तो उससे सात ऐसी भूलें होती हैं जो उसे महादेव से दूर कर देती हैं :
संत में अश्रद्धा (पहला अपराध) : महर्षि अगस्त्य जैसे परम ज्ञानी संत के प्रति पूज्यता का भाव न रखना और उन्हें अपने से छोटा समझ लेना ।
शास्त्र में अश्रद्धा (दूसरा अपराध): राम कथा के प्रति आदर व्यक्त न करना और प्रभु की दिव्य कथा को ध्यान पूर्वक न सुनना ।
पति में अश्रद्धा (तीसरा अपराध) : साक्षात जगतगुरु भगवान शिव के वचनों पर अविश्वास करना और अपने ही स्वामी के प्रति श्रद्धा खो देना ।
ईश्वर को न स्वीकारना (चौथा अपराध): साक्षात पूर्ण ब्रह्म भगवान श्रीराम को परमात्मा न मानकर साधारण मनुष्य समझने की भूल करना ।
प्रभु की परीक्षा लेना (पांचवां अपराध): अज्ञानवश भगवान के स्वरूप और उनकी शक्ति को आंकने के लिए उनकी परीक्षा लेने की चेष्टा करना ।
अहंकारवश स्वरूप बदलना (छठा अपराध): मर्यादा और सत्य को भूलकर परीक्षा लेने हेतु जगत जननी माता सीता का रूप धारण करना ।
असत्य का सहारा (सातवां अपराध): परीक्षा लेने के बाद भी अंतर्यामी महादेव के पूछने पर सच न बोलकर असत्य का सहारा लेना ।
“व्यास पीठ का दिव्य संदेश, हठ नहीं,समाधान खोजे”
पंडित श्याम मनावत जी ने माचलपुर के प्रबुद्ध श्रोताओं और गोयल परिवार को जीवन का मूल मंत्र देते हुए कहा कि— “यदि जीवन में कभी भी कोई वैचारिक द्वंद्व या तर्क पैदा हो,तो हठी बनने के बजाय उसके सात्विक समाधान की ओर कदम बढ़ाएं । कुतर्क हमेशा मनुष्य को अंधकार की ओर ले जाता है,जबकि जीवन की वास्तविक पूर्णता ‘श्रद्धा’ (माता पार्वती) बनने में है” ।
कथा के दौरान जब पंडित जी ने अपनी मधुर और ओजस्वी वाणी में शिव भजनों की प्रस्तुतियां दीं,तो पूरा अग्रवाल धर्मशाला परिसर ‘हर-हर महादेव’ और ‘बम-बम भोले’ के जयघोष से गुंजायमान हो उठा श्रद्धालु झूमने लगे । यजमान अरुण कुमार गोयल सहित उपस्थित सैकड़ों श्रद्धालुओं ने परम पवित्र शिव महापुराण ग्रंथ और व्यास पीठ की महाआरती कर पुण्य लाभ अर्जित किया ।










