आज़ादी की अधूरी गाथा को पूरा करने निकला था माचलपुर का वो लाल: शहीद कल्याणमल शर्मा-
घनश्याम शर्मा माचलपुर
15 अगस्त 2026 आज जब देश अपनी आज़ादी का 79 वां महापर्व मना रहा है,चारों तरफ ढोल-नगाड़ों की थाप है,आसमान में तिरंगों की छटा है और हर दिल में राष्ट्रगान की धुन गूंज रही है, तब काल के कपाल पर इतिहास की एक ऐसी स्याही से लिखी दास्तान को याद करना ज़रूरी है, जिसने आज़ादी के असली मायनों को मुकम्मल किया था । यह कहानी किसी महलों में रहने वाले राजा या बड़ी सेनाओं के सेनापति की नहीं है ; यह कहानी है मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के एक छोटे से शांत कस्बे माचलपुर ( पिपल्या कुल्मी) के उस साधारण से दिखने वाले असाधारण ब्राह्मण परिवार के नौजवान की, जिसकी रगों में बहता खून भारत माता की मिट्टी के कर्ज को चुकाने के लिए मचल रहा था। नाम था— कल्याणमल शर्मा (कल्याण शर्मा)।
एक ऐसे अमर और इतिहास में हमेशा याद रखे जाने वाले नायक,जिन्होंने देश के आजाद होने के आठ साल बाद,एक बार फिर आज़ादी का कफ़न अपने सिर पर बांधा और गोवा की धरती को पुर्तगाली बेड़ियों से मुक्त कराने के लिए हंसते-हंसते अपने प्राण न्योछावर कर दिए । आज इस विशेष अंक में, हम माचलपुर ( पिपल्या कुल्मी) के उस लाल की शुरुआत से लेकर शहादत, राजगढ़ जिले के अन्य वीर सत्याग्रहियों के योगदान और फिर दशकों की उपेक्षा के बाद मिले सम्मान की पूरी गाथा को शब्दों के अर्घ्य से पूज रहे हैं ।
“जब देश आज़ाद था,तब भी उनका दिल गुलाम था : आंदोलन की पृष्ठभूमि”
इतिहास के पन्नों को पलटिए। 15 अगस्त 1947 को जब दिल्ली के लाल किले से पंडित जवाहरलाल नेहरू ने ‘नियति से साक्षात्कार’ का ऐतिहासिक भाषण दिया था, तब पूरा देश घी के दीयों की रोशनी में नहा रहा था । लेकिन बहुत कम लोग जानते थे कि उस जश्न के बीच भी भारत माता का एक अंग— सुदूर दक्षिण में समुद्र किनारे स्थित ‘गोवा’— अब भी पुर्तगाली शासक सालाज़ार के जुल्मों की औपनिवेशिक कालिख में डूबा हुआ था । पुर्तगाली वहां के भारतीयों पर अमानवीय अत्याचार कर रहे थे, वंदे मातरम बोलने पर जेलों में ठूंस रहे थे ।
माचलपुर की गलियों में घूमने वाले युवा कल्याणमल शर्मा का शरीर भले ही आज़ाद भारत की हवाओं में सांस ले रहा था,लेकिन उनका दिल गोवा के भाइयों और बहनों की गुलामी को देखकर दिन-रात तड़प रहा था । वे अक्सर अपने साथियों से कहते थे कि,”जब तक देश का एक भी हिस्सा गुलाम है, तब तक पूरे भारत की आज़ादी अधूरी है । हम कटे हुए अंगों के साथ आज़ादी का जश्न कैसे मना सकते हैं” ? मातृभूमि के प्रति इसी अगाध प्रेम और छटपटाहट ने उन्हें एक सामान्य नागरिक से स्वतंत्रता संग्राम सेनानी बना दिया ।
“राजगढ़ के जांबाजों का संयुक्त जत्था : ब्यावरा और सुठालिया से उठी हुंकार”
वर्ष 1955 की गर्मियों में जब देश के सभी प्रमुख राजनीतिक दलों, समाजवादी विचारकों और राष्ट्रवादी संगठनों ने मिलकर ‘गोवा मुक्ति आंदोलन’ (गोवा विमोचन सहायक समिति) के तहत एक विशाल देशव्यापी सत्याग्रह का शंखनाद किया,तो कल्याणमल शर्मा के भीतर का सोया हुआ राष्ट्रभक्त ज्वालामुखी बनकर फट पड़ा। उन्होंने अपने घर,परिवार, व्यापार और सुनहरे भविष्य की सारी चिंताएं एक झटके में छोड़ दीं ।
राजगढ़ जिले की माटी की तासीर ही ऐसी है कि यहाँ जब देश का बुलावा आता है, तो यहाँ के वीर पीछे नहीं हटते । इस ऐतिहासिक सर्वदलीय और राष्ट्रव्यापी जन-आंदोलन के लिए केवल माचलपुर ही नहीं, बल्कि समूचे राजगढ़ जिले से राष्ट्रभक्तों का एक शक्तिशाली संयुक्त जत्था तैयार हुआ। इस जत्थे में माचलपुर के कल्याणमल शर्मा के साथ जिले के दो और वीर सपूत— श्याम भरथरे और बाबूलाल सौंधिया कंधे से कंधा मिलाकर खड़े थे।
सिर्फ यही नहीं,इस आंदोलन को अदम्य साहस और राजनीतिक धार देने के लिए राजगढ़ के प्रखर समाजवादी नेता रामकरण उग्र (जो बाद में ब्यावरा के लोकप्रिय विधायक भी बने) और विशेष रूप से ब्यावरा के सुठालिया अंचल से प्रखर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पंडित शिवदयाल मिश्र भी अपने प्राणों की बाजी लगाने घर से निकल पड़े थे । सुठालिया के पंडित शिवदयाल मिश्र और रामकरण उग्र जैसे राष्ट्रभक्तों की रगों में भी मातृभूमि की मुक्ति का वही खून दौड़ रहा था । इन सभी युवाओं के चेहरों पर मौत का डर नहीं,बल्कि अपनी मातृभूमि को अखंड देखने का एक सम्मोहन था । पूरा राजगढ़ जिला उस समय दलगत राजनीति से ऊपर उठकर केवल देशभक्ति के एक ही महा-सूत्र में बंध चुका था ।
14 अगस्त 1955 को राजगढ़ जिले का यह संयुक्त सत्याग्रही जत्था कर्नाटक के बेलगाम (Belgaum) पहुंचा । वह रात घनी थी, डरावनी थी। सब जानते थे कि सुबह मौत के साए से सामना होना है, क्योंकि पुर्तगाली सरकार ने घोषणा कर रखी थी कि जो भी सीमा पार करेगा, उसे सीधे गोली मार दी जाएगी । लेकिन इन सत्याग्रहियों की आंखों में खौफ की जगह तिरंगे की चमक थी रात भर बेलगाम के शिविर में भारत माता के जयकारे गूंजते रहे । रणनीति तय हो चुकी थी— हाथ में सिर्फ और सिर्फ राष्ट्रध्वज होगा,कोई हथियार नहीं वे पुर्तगाली बंदूकों का सामना अपनी अहिंसा और मजबूत सीने से करने वाले थे ।
“15 अगस्त 1955,जब तिरंगे के रंग में घुला कल्याणमल का रक्त”
ठीक 71 साल पहले,आज ही के दिन यानी 15 अगस्त 1955 की सुबह,जब शेष भारत अपनी आज़ादी की आठवीं वर्षगांठ की खुशियां मना रहा था, प्रभात फेरियां निकाल रहा था,ठीक उसी समय कल्याणमल शर्मा अपने साथियों, रामकरण उग्र,पंडित शिवदयाल मिश्र और राजगढ़ जिले के अन्य सत्याग्रहियों के साथ हाथों में तिरंगा थामे,नंगे पैर, ‘भारत माता की जय’ और ‘गोवा भारत का है’ के गगनभेदी नारे लगाते हुए गोवा की सीमा में दाखिल हो रहे थे ।
सीमा पर पुर्तगाली सैनिक तैनात थे, जिनके हाथों में आधुनिक स्वचालित राइफल्स थीं और दिलों में भेड़ियों जैसी क्रूरता,निहत्थे और शांतिपूर्ण सत्याग्रहियों को आगे बढ़ता देख पुर्तगाली कमांडर बौखला गया । उसने बिना किसी चेतावनी, बिना किसी लाठीचार्ज के, सीधे सत्याग्रहियों के सीने पर गोली मारने का क्रूर हुक्म दे दिया ।
कड़कड़ाहट हुई… बंदूकों से आग की लपटें निकलीं… और चारों तरफ चीख-पुकार मच गई ।
एक खूनी गोली वीर कल्याणमल शर्मा के सीने को चीरती हुई पार हो गई । चश्मदीद गवाह बताते हैं कि वह दृश्य रूह कंपा देने वाला लेकिन गौरव से भर देने वाला था गोली लगने के बाद भी उस वीर के हाथ से तिरंगा नीचे नहीं गिरा । खून के फव्वारे छूट रहे थे, माचलपुर का वो लाल अपनी ही मातृभूमि की मिट्टी पर गिर रहा था, लेकिन गिरते-गिरते भी उसने तिरंगे को आसमान की तरफ उठाए रखा और आखिरी सांस छोड़ते हुए नारा लगाया— “गोवा भारत का है… वंदे मातरम!” उनके ठीक बगल में राजगढ़ के श्याम भरथरे और बाबूलाल सौंधिया भी उसी बर्बर गोलीकांड का शिकार होकर भारत माता की अमर गोदी में सो गए । ब्यावरा और सुठालिया से गए उनके साथी रामकरण उग्र और पंडित शिवदयाल मिश्र इस भीषण दमन, लाठी-गोली और पुर्तगाली बर्बरता के बीच भी सीना ताने डटे रहे । उन्होंने गोवा की धरती पर पुर्तगाली हुकूमत की चूलें हिला दीं कल्याणमल शर्मा 15 अगस्त के दिन ही इतिहास के पन्नों में हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गए।
“चंदन की चिता और बेलगाम का वो रोता हुआ आसमान”
शहादत के बाद जब इन वीरों के पार्थिव शरीरों को एक विशेष सैन्य ट्रेन के जरिए वापस बेलगाम (कर्नाटक) लाया गया, तो वहां का मंजर देखकर पत्थरों का दिल भी पिघल गया । हज़ारों-लाखों की भीड़ स्टेशन से लेकर सड़कों तक जमा थी माताओं ने इन शहीदों के पैरों की धूल को अपने माथे पर लगाया, बहनों ने आरती उतारी और उस दिन ऐसा लगा मानो इंसानों के साथ-साथ आसमान भी रो पड़ा हो ।
राजगढ़ के इन सपूतों का अंतिम संस्कार मध्य प्रदेश में नहीं हो सका, बल्कि उसी बेलगाम की पावन धरती पर चंदन की चिताओं पर पूरे राजकीय सम्मान के साथ किया गया । जलती हुई चिता की वो लपटें चीख-चीख कर गवाही दे रही थीं कि एक मध्य प्रदेश का बेटा, गोवा को आज़ाद कराने के लिए कर्नाटक की सीमा पर पंचतत्व में विलीन हो रहा था । यही तो था उस दौर के अखंड भारत का असली, जीवंत और रोंगटे खड़े कर देने वाला स्वरूप !
“दशकों की उपेक्षा का दंश: कई सरकारें आईं-गईं, पर भूल गईं अपना फर्ज”
लेकिन इतिहास के पन्ने इस बात के गवाह हैं कि इस कृतघ्न व्यवस्था ने अपने महानायकों को याद करने में अक्सर बड़ी और अक्षम्य देर की है । आज़ादी के बाद देश में दशकों बीत गए । दिल्ली के लाल किले से लेकर भोपाल के वल्लभ भवन की सियासत में कई सरकारें बनीं, बिगड़ीं और बदलीं कई वादे आए, कई घोषणाएं हुईं, कई योजनाएं वीरों के नाम पर शुरू हुईं,लेकिन माचलपुर की जिस पवित्र मिट्टी ने इस महान सपूत को जन्म दिया था, वहां दशकों तक उनकी एक प्रतिमा तक नहीं लग पाई ब्यावरा और सुठालिया के उन जांबाज सत्याग्रहियों का नाम भी सरकारी दस्तावेजों की धूल में दबा रहा ।
साल दर साल 15 अगस्त और 26 जनवरी आते रहे,भाषणों के अंबार लगते रहे, लेकिन शहीद कल्याणमल शर्मा का परिवार गुमनामी के अंधेरे में अपनी आँखों के आँसू पोंछता रहा । शहीदों के हिस्से की यह सरकारी उपेक्षा, वास्तव में उस पवित्र लहू का अपमान थी जो गोवा की सीमा पर बहा था । माचलपुर और पूरे राजगढ़ के नागरिकों के दिलों में यह टीस एक नासूर की तरह चुभती थी कि जिस लाल ने जिले का नाम अमर किया, व्यवस्था उसे ही भुलाए बैठी है ।
“दो वर्ष पूर्व का वो ऐतिहासिक प्रायश्चित, जब बस स्टैंड चौराहे पर मुस्कुरा उठे “कल्याणमल”
पर कहते हैं न कि समय क्रूर हो सकता है,लेकिन इतिहास अपने असली नायकों को कभी मरने नहीं देता । ठीक दो वर्ष पूर्व (वर्ष 2024 में), माचलपुर की वर्तमान नगर परिषद ने एक ऐसा ऐतिहासिक और साहसिक फैसला लिया, जिसने दशकों पुरानी इस व्यवस्थापकीय भूल का प्रायश्चित कर दिया । विधायक हजारीलाल दांगी अध्यक्ष गीताबाई मालवीय सहित परिषद ने सर्वसम्मति से संकल्प लिया कि जिस शहीद ने माचलपुर और राजगढ़ जिले को पूरे देश के नक्शे पर गौरव दिलाया, उसे उसकी अपनी ही माटी में, उसी के अपनों के बीच सर्वोच्च सम्मान दिया जाएगा ।
वह दिन माचलपुर के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जा चुका है वह दृश्य अद्भुत था,आँखों को भिगो देने वाला और रोंगटे खड़े कर देने वाला था । मंच पर शहीद कल्याणमल शर्मा के वृद्ध पुत्र, उनकी पुत्रवधू और उनका पूरा परिवार सम्मान सहित मौजूद था उनकी आँखों में दशकों का दर्द और आज मिला संतोष, साफ आँसू बनकर बह रहा था ।
पूरे नगर की गवाहियों के बीच, माचलपुर के बस स्टैंड चौराहे पर वीर शहीद कल्याणमल शर्मा की भव्य, जीवंत और ओजस्वी प्रतिमा का अनावरण किया गया । उस दिन सिर्फ एक पाषाण की मूर्ति स्थापित नहीं हुई थी,बल्कि माचलपुर की धरती ने अपने सीने से दशकों पुराना एक कर्ज उतारा था जिसका सौभाग्य वर्तमान परिषद को मिला और व्यवस्था ने शहीद के चरणों में झुककर अपनी गलती की माफी मांगी थी ।
कल्याणमल शर्मा, श्याम भरथरे, बाबूलाल सौंधिया, रामकरण उग्र और ब्यावरा-सुठालिया के वीर पंडित शिवदयाल मिश्र का त्याग बेकार नहीं गया था । उनके पवित्र लहू ने देश के भीतर गोवा मुक्ति की आग को इतना भड़का दिया था कि आखिरकार दिसंबर 1961 में तत्कालीन भारत सरकार को मजबूर होकर अपनी सेना को आदेश देना पड़ा,भारतीय सेना ने ‘ऑपरेशन विजय’ चलाया और पुर्तगालियों को दुम दबाकर भारत से भागना पड़ा ।
हे अमर शहीद कल्याणमल शर्मा ! आज आपकी यह भूमि और जिला यह पूरा कृतज्ञ राष्ट्र आपकी पावन स्मृति के सामने दंडवत प्रणाम करता है,आप कल भी अमर थे, आप आज भी अमर हैं ।
वीर शहीद कल्याणमल शर्मा अमर रहें !
भारत माता की जय! जय हिंद, जय भारत !










